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एक ऐसा कलचुरी संत जो मंदिरों में स्थापित करा रहा सहस्रबाहु प्रतिमाएं; डा. हरिहरानंद स्वामी का मिशन, ‘हर गांव-शहर’ में हो सहस्रबाहु मंदिर

भोपाल।
अपने जीवन की सूक्ष्म आवश्यकताओं के लिए दान स्वीकार करने वाले संत, वक्त आने पर समाजहित के बड़े लक्ष्यों के लिए दान देने से पीछे नहीं हटते हैं। संतों की यही पहचान है। हिंदू धर्म में महर्षि दधीच जैसे संत भी हुए हैं जिन्होंने असुरों के संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान कर दी थीं।
आज हम कलचुरी समाज के एक ऐसे संत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने शहर-गांवों में कलचुरी समाज के आराध्य देव भगवान सहस्रबाहु के मंदिर की स्थापना के लिए लोगों को प्रेरित करने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्होंने नवनिर्मित मंदिरों में भगवान सहस्रबाहु और शिव-परिवार की प्रतिमाएं अपनी ओर से स्थापित करने का उपक्रम शुरू किया है। यह संत शिरोमणि हैं डा. हरिहरानंद स्वामी महाराज। एलएनसीटी यूनीवर्सिटी भोपाल से ‘डॉक्टरेट’ की मानद उपाधि से विभूषित संत डा. हरिहरानंद स्वामी जयपुर में समाज के भवन में भगवान सहस्रबाहु अर्जुन की प्रतिमा स्थापित करा चुके हैं, और दो अन्य मंदिरों में भी ऐसी ही प्रतिमाएं स्थापित करने का संकल्प लिया है।
कलचुरी संत डा. हरिहरानंद स्वामीजी का वास्तवित नाम श्री हरीशचंद धनेटवाल है, जो राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) के अधिकारी रहे और रिटायर होने के बाद धर्म-सेवा के लिए वृंदावन में अपना आश्रम बना लिया। डा. हरिहरानंदजी ने शिवहरेवाणी को बताया कि कलचुरी समाजबंधुओं की उपस्थिति वाले हर गांव-शहर में भगवान श्री सहस्रबाहु अर्जुन का मंदिर होना चाहिए। उन्हें लगता है कि समाज में एकता और एकजुटता के लिए यह एक अहम कदम हो सकता है। उन्होंने तीन वर्ष पूर्व जयपुर स्थित कलाल समाज भवन एवं छात्रावास में नवनिर्मित मंदिर में भगवान सहस्रबाहु की प्रतिमा अपनी से स्थापित कराई थी। अब सहस्रबाहु की एक अन्य प्रतिमा प्रयागराज भिजवा रहे हैं, जो वहां नवनिर्मित सहस्रबाहु मंदिर में यह प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
संत शिरोमणि डा. हरिहरानंद स्वामी ने शिवहरेवाणी को बताया कि भगवान सहस्रबाहु की तीसरी प्रतिमा का निर्माण कार्य चल रहा है। पूर्ण होते ही इस प्रतिमा को भोपाल भेजा जाएगा जो एकतापुरी में पुनर्निर्माणाधीन मंदिर में स्थापित की जाएगी। एक प्रतिमा उदयपुर के लिए भिजवाने की इच्छा भी उन्होंने जाहिर की है। बात सिर्फ सहस्रबाहु प्रतिमा तक सीमित नहीं है, बल्कि मंदिरों के निर्माण में भी वह यथासंभव सहयोग कर रहे हैं।
आरएएस अधिकारी के रूप में रिटायरमेंट
डा. हरिहरानंद स्वामी की गिनती वृंदावन के ज्ञानी संतों में की जाती है। साधुओं की बड़ी बैठकों और विषय-मंथन में उनकी उपस्थिति अनिवार्य रहती है। डा. हरिहरानंद का वास्तविक नाम हरीशचंद्र धनेटवाल है। इंग्लिश, संस्कृत और दर्शन के होनहार छात्र रहे हरीशचंद्र धनेटवाल ने स्नातकोत्तर के बाद अपने जीवन की शुरुआत राजस्थान में शिक्षा विभाग में सेवा से की। बाद में एक्साइज डिपार्टमेंट और पंजीयन विभाग में काम करते हुए आरएएस (राजस्थान प्रशासनिक सेवा) में आए और 1999 में जैसलमेर के ‘असिस्टेंट कलक्टर एंड मजिस्ट्रेट’ पद से रिटायर हुए।
सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक सेवा
सरकारी सेवा से रिटायरमेंट के बाद श्री हरीशचंद्र धनेटवाल सामाजिक सेवा में सक्रिय हो गए। वह अखिल भारतीय जायसवाल सर्ववर्गीय महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष रहे, और राजस्थान प्रांत की स्वजातीय संस्था के तीन बार प्रांतीय अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने कई सामूहिक विवाह एवं परिचय सम्मेलन जैसे आयोजन भी कराए। सामाजिक कार्यों के लिए राजस्थान सरकार ने वर्ष 2007 में उन्हें भामाशाह की उपाधि से सम्मानित किया। करीब 10-11 वर्ष सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने के बाद वर्ष 2010-11 में उन्होंने दौसा के कीर्तिशेष समाजसेवी श्री रामस्वरूप जायसवाल को दायित्व सौंपकर धर्म-आध्यात्म के क्षेत्र में पदार्पण किया, जहां हरिहरानंद स्वामी के रूप में उनकी नई पहचान बनी।
वृंदावन से था लगाव, अब वहीं निवास
श्री हरिहरानंदजी स्वामी ने शिवहरेवाणी को बताया कि वह और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती द्रौपदी धनेटवाल नियमित रूप से भगवान श्रीकृष्ण की भूमि वृंदावन आते-जाते थे। वृंदावन से ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने बहुत पहले वहां बसने का इरादा कर लिया। 2006 में उन्होंने वृंदावन में इस्कॉन मंदिर के निकट बालाजी आश्रम के पास ही एक भूखंड ले लिया और, 2011 में सामाजिक दायित्वों से मुक्त होकर पत्नी के साथ यहां आ बसे।
लेखन, अनुवाद और व्याख्यान
वृंदावन में आने के बाद श्री हरिहरानंदजी स्वामी ने प्राचीन धार्मिक एवं आध्यात्मिक साहित्य पर विशेष कार्य किया। ‘द डायमंड्स ऑफ वाल्मीकी रामायण‘ उनकी सबसे चर्चित पुस्तक है। इसके अलावा ‘गोस्वामी बांकेबिहारी के चमत्कार’, ‘कलिकाल की लाडली बेटियों के नाम’, ‘जन्नत धरती पर उतरेगी’ समेत दर्जनभर से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने श्रीमदभागवत गीता का इंग्लिश अनुवाद भी किया। खास बात यह है कि गीता के अनुवाद में उन्होंने श्लोकों के सरल अंग्रेजी भावार्थ के साथ ही अंग्रेजी में विश्वस्तरीय उच्चारण को शामिल किया है। बीते 4-5 वर्षों से विभिन्न टीवी चैनलों पर उनके व्याख्यानों का नियमित प्रसारण भी हो रहा है। वर्तमान में संतवाणी चैनल पर प्रत्येक रविवार को उनका प्रोग्राम प्रसारित होता है। श्री हरिहरानंदंजी स्वामी अपने व्य़ाख्यान में संस्कृत में श्लोक बोलकर सरल हिंदी और अंग्रेजी में उसकी व्याख्या करते है।

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