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दाऊजी मंदिर में 13 नवंबर, राधाकृष्ण मंदिर में 14 नवंबर को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव

आगरा।
पंचोत्सव या दीपोत्सव में तीसरा दिन यानी दिवाली को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। आज पूरे देश में हर जगह किसी न किसी रूप में दिवाली मनाई जा रही है। जहां तक ब्रज क्षेत्र की बात है तो यहां चौथे दिन अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा को इस दीपोत्सव का सबसे अहम दिन माना जाता है। अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा सामूहिकता की परंपरा से जुड़ी पूजा है। घर-परिवार, कुल और समाज, तीनों स्तरों पर यह पर्व मनाने की परंपरा रही है। इसीलिए अन्नकूट और गोवर्धन पूजा के सामाजिक आयोजनों का विशेष महत्व है जो प्रकाशोत्सव को पूर्णता प्रदान करते हैं।
हालांकि इस बार गोवर्धन पूजा दो दिन, 13 और 14 नवंबर को मनाई जा रही है। ऐसे में आगरा में शिवहरे समाज की प्रमुख धरोहर दाऊजी मंदिर में 13 नवंबर को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव रखा गया है, जबकि राधाकृष्ण मंदिर में यह आयोजन अगले दिन 14 नवंबर को होगा। दाऊजी मंदिर में शाम सात बजे गोवर्धन पूजा के बाद अन्नकूट की प्रसादी का वितरण किया जाएगा। जबकि राधाकृष्ण मंदिर में 14 नवंबर की शाम छह बजे से गोवर्धन पूजा और अन्नकूट प्रसादी का आयोजन होगा। दोनों मंदिर समितियों ने समाजबंधुओं से इन आयोजनों में शामिल होने का आग्रह किया है।
आपको बता दें कि ब्रज क्षेत्र में दिवाली मनाने की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। जानकारों का मानना है कि ब्रज में दिवाली मनाने की परंपरा बमुश्किल 400 वर्ष पहले से शुरू हुई होगी। इससे पहले गोवर्धन पूजा का त्योहार ही दिवाली की तरह मनाया जाता था। लोग मंदिरों में दीये जलाते थे और गोवर्धन पूजा के बाद अन्नकूट का वितरण हुआ करता था, जो आज भी प्रचलित है।
ब्रज में गोवर्धन पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। इससे पहले ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी। मगर भगवान कृष्ण ने लोगों से कहा कि इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं प्राप्त होता। वर्षा करना उनका कार्य है और वह सिर्फ अपना कार्य करते हैं जबकि गोवर्धन पर्वत गौ-धन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है, जिससे पर्यावरण भी शुद्ध होता है। इसलिए इंद्र की नहीं गोवर्धन की पूजा की जानी चाहिए।
इसकी जानकारी होने इंद्र ने भारी वर्षा कर ब्रजवासियों को डराने का प्रयास किया, लेकिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर ब्रजवासियों को उनके कोप से बचा लिया। सब ब्रजवासी सात दिन गोवर्धन पर्वत की शरण मे रहे। इन सातों दिनों ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत के नीचे मिलजुल कर भोजन तैयार किया और सामूहिक रूप से ग्रहण किया। इसके बाद से ही इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधान शुरू हो गया है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण का इंद्र के मान-मर्दन के पीछे उद्देश्य था कि ब्रजवासी गौ-धन एवं पर्यावरण के महत्व को समझें और एकजुट होकर उनकी रक्षा करें।
वहीं अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न का समूह। विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित करने के कारण ही इस उत्सव या पर्व को नाम अन्नकूट पड़ा है। अन्नकूट में अन्न और शाक-पकवान भगवान को अर्पित किये जाते है और वह सर्वसाधारण में वितरण किया जाता है।
गोवर्धन पूजा घर, परिवार और कुल में तो अनिवार्य रूप से की जाती है, लेकिन इस पूजा का परम उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब हम सामूहिक आयोजनों में भाग लें, पूजा करें और अन्नकूट का प्रसाद का ग्रहण करेंगे। आगरा के शिवहरे समाज का सौभाग्य है कि यहां उसकी दो ऐसी धरोहरें हैं जहां गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट का आयोजन होता है। ऐसे में समाज के सभी बंधुओं के लिए मौका होता है कि इस पूजा में भाग लेकर इसके पुण्य को प्राप्त करें।

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