by Som Sahu June 20, 2017 शख्सियत 132
शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा।
सुप्रसिद्ध खगोलविज्ञानी मेघनाद साहा को विज्ञान के क्षेत्र में अमूल्य योगदान, खासकर साहा समीकरण के प्रतिपादन के लिए जाना जाता है जो तारों में भौतिक और रासायनिक स्थिति की व्याख्या करती है। 6 अक्टूबर 1893 को ढाका के एक कलचुरि परिवार में जन्मे मेघनाद साहा के नाम एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि उनकी अध्य़क्षता मे गठित विद्वानों की एक समिति ने भारत के राष्ट्रीय शक पंचांग का भी संशोधन किया, जिसे 22 मार्च 1957 (1 चैत्र, 1879 शक) से लागू किया गया।
मेघनाद साह का जन्म बंगाल में ढाका जिले के सिओराताली गाव में शोंडिक वर्ग के कलचुरि परिवार में हुआ। पिता जगन्नाथ साहा की किराना की दुकान थी। मां भुवनेश्वरी देवी घरेलू महिला थीं। 1905 में ब्रिटिश शासन ने बंगाल के विभाजन का फैसला किया, जिसका भारी विरोध हुआ। उस समय पूर्वी बंगाल के गवर्नर बैंपफील्ड फुलर कोलेजियेट स्कूल में दौरा करने आए, तब मेघनाद साहा ने अपने कुछ साथी छात्रों के साथ उनके दौरे का बहिष्कार किया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें स्कूल से निलंबित कर दिया गया और उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। उन्होंने किशोरीलाल जुबली स्कूल में दाखिला लिया और 1909 में कलकत्ता यूनीवर्सिटी की भर्ती परीक्षा पास कर ली। 1911 में उन्होने आईएसई की परीक्षा पास की। इसके बाद साहा ने प्रेसीडेंसी कालेज कलकत्ता में प्रवेश लिया और 1913 में गणित विषय से स्नातक की परीक्षा न केवल पास की, बल्कि पूरी यूनीवर्सिटी में उन्होंने दूसरा स्थान मिला। 1915 में मेघनाद ने एम.एससी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण की।
1917 में मेघनाद साहा कलकत्ता के यूनीवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुए जहां उन्होने छात्रों को क्वांटम फिजिक्स पढ़ाई। इस दौरान खगोलविज्ञान पर उनके शोधपत्र प्रतिष्ठित मैग्जीन फिलोसोफिकल मे प्रकाशित होने लगे थे। उन्होंने महान वैज्ञानिकों अल्बर्ट आइंसटीन और निकोवस्की के सापेक्षता पर जर्मन भाषा में लिखे पत्रों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। 1918 में थीसिस ऑफ रेडियेशन, प्रेशर एंड इलेक्ट्रोमैग्नेटिक थ्योरी के लिए साहा को कलकत्ता यूनीवर्सिटी ने डी.एससी. की उपाधि प्रदान की।
1919 में एक अमेरिकी जोर्नल में उनका रिसर्च पेपर- ऑन सिलेक्टिव रेडियेशन प्रेशर एंड इट्स एप्लीकेशन- शीर्षक से प्रकाशित हुआ। साहा ने अपने शोधपत्र ‘आयोनाइजेशन इन द सोलर क्रोमोसेफियर’ में आयनीकरण का सटीक सूत्र प्रस्तावित किया जिसे उनके नाम ‘साहा आयोनाइजेशन फार्मूला’ से जाना जाता है। साहा उस समय विज्ञानजगत में चर्चा में आ गए, जब अपने अगले शोधपत्र में तापमान और दबाव को पर्याप्त महत्व देते हुए अपना आयोनाइजेशन या आयनीकरण का फार्मूला लागू किया। रॉयल सोसाइटी की बैठक में प्रोफेसर फावलर ने उनके इस कार्य की जमकर तारीफ की और इसे खगोल भौतिकी (एस्ट्रोफीजिक्स) के क्षेत्र में महानतम योगदान बताया।
सन् 1859 में किरचफ की खोज ‘डिस्कवरी ऑफ स्पैक्ट्रम एनालसिस’ के बाद इसे सबसे महत्वपूर्ण शोध माना गया था। भौतिकशास्त्र से जुड़े अन्य विषयों जैसे ब्रह्माण्ड विकिरण भौतिकी(Cosmic Ray Physics) एवं नाभिकिय भौतिकी(Nuclear Physics) पर भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया। सन् 1927 में उन्हें ‘फैलो ऑफ रॉयल सोसायटी’ चुना गया, हालांकि तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया इंटेलिजेंस विभाग के अड़ंगे की वजह से इसमें देरी हुई। कॉम्टन द्वारा नोबल पुरस्कार के लिए उनके नाम की अनुशंसा के बावजूद उन पर विचार नहीं किया गया।
कारनेगी ट्रस्ट की एक फैलोशिप पर उन्होंने यूरोप एवं अमेरिका की यात्रा की। इसी दौरान उन्होंने विकास में नाभिकिय भौतिकी के महत्व को जाना। नाभिकिय भौतिकी पर आयोजित कोपेनहेगन कांफ्रेंस में उनकी मुलाकात कुछ वैज्ञानिकों से हुई और उनसे चर्चा के बाद उन्होंने परमाणु शक्ति के रूप भारत का सपना देखा। इन्होंने साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान तथा इण्डियन एसोसियेशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साईन्स नामक दो महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की।
1952 में लोकसभा चुनाव में वह उत्तरी कोलकाता संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए और बड़े अंतर से जीत दर्ज की। 16 फरवरी, 1856 को हार्टअटैक के चलते उनका निधन हो गया।
(संकलनः संजयकुमार जायसवाल)
