August 6, 2026
शिवहरे वाणी, D-30, न्यू आगरा, आगरा-282005 [भारत]
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हौसले से हारा कैंसर, रमेश चौकसे और रूबी अब दूसरों को दे रहे हैं हौसला

शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा
कैंसर जैसी बीमारी को लेकर बहुत सी भ्रांतियां हैं। एक सबसे बड़ी भ्रांति है कि कैंसर लाइलाज है और यह रोग एक तरह से मौत का सर्टिफिकेट है। यह भी सत्य है कि दुनिया में ऐसी कोई समस्या है ही नहीं जिसका निदान न हो। निदान मिलने में देर भले ही हो सकती है। कैंसर पर नित नए अनुसंधान हो रहे हैं। लेकिन इस बात पर सब सहमत हैं कि कैंसर से हौसले के साथ लड़ना ही इसकी सबसे असरदार उपचार है और यह दवाओं के प्रभाव को भी बढ़ाता है। इस बात को रमेश चौकसे और रूबी अहलुवालिया से बेहतर भला कौन जान सकता है। भेल (भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स) कारखाने से रिटायर हुए इंजीनियर रमेश चौकसे ने फेफड़े के कैंसर जैसी बीमारी से अपने आत्मबल के बूते निजात पा ली। आज वह पूरी तरह स्वस्थ हैं और अब लोगों को कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने के उपाय बता रहे हैं, कैंसर के मरीजों को हौसला दे रहे हैं। इसे ‘साइको सोशियो केर गिविंग कैंसर ट्रीटमेंट’ कहते हैं जिसे मुंबई मे कलचुरी समाज की रूबी अहलुवालिया ने स्तर कैंसर से उबरने के बाद एक अभियान का रूप दिया है।

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भौपाल में रहने वाले रमेश चौकसे को वर्ष 2007 में फेफड़े के कैंसर की बीमारी का पता चला। तब तक कैंसर अपनी अंतिम स्टेज पर पहुंच चुका था। कैंसर का खौफ इस कदर तारी है कि इसका पता चलने पर ही मरीज अवसाद और हताशा से घिर जाता है। यही मनोस्थिति कैंसर के उपचार में सबसे बड़ी बाधा है। बीमारी का पता चलने पर रमेश चौकसे ने अपने हौसले को बनाए रखा। यह हौसला और आत्मबल उस स्थिति में भी बरकरार रखा, जब वह बीमारी से इतने कमजोर हो गए कि डाक्टर ने आपरेशन करने तक से इनकार कर दिया। शरीर कमजोर होने के कारण डाक्टर कीमो थैरैपी के लिए भी तैयार नहीं हुए। तब रमेश चौकसे ने इंटरनेट पर इसके उपाय तलाशने शुरू कर दिए। कोई कैंसर मरीज जिस हालत में बिस्तर से नहीं उठ पाता, उस हालत में चौकसे ने कुर्सी पर बैठकर कंप्यूटर पर इंटरनेट को खंगाला, चिकित्सकों की सलाह पर काम किया, और अंततः फेफड़े के कैंसर को मात दे दी।

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कुछ ऐसी ही कहानी है कलचुरी परिवार की रूबी अहलुवालिया की। इन्होंने अपने आत्मबल से कैंसर को मात दी, और अब ऐसे लोगों की एक टीम तैयार की है जिन्होंने उनकी तरह की कैंसर को मात की है। अब यह टीम कैंसर पीड़ित लोगों से मिलती है और उन्हें कैंसर से लड़ने का हौसला देती है। साथ ही उन्हें कैंसर  से उपचार से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी शेयर करती है। रूबी को खुद को स्तन कैंसर होने की जानकारी 43 वर्ष की उम्र में उस समय हुई, जब उनकी बीमारी तीसरी स्टेज पर थी। रेलवे की उच्च अधिकारी रूबी को परिवार के लोगों का साथ मिला और हौसले से जिंदगी की जंग लड़ी। आज उनकी संस्था संजीवनी-लाइफ बियांड कैंसर नौ बड़े शहरों में काम कर रही है और लोगों को इस कैंसर से लड़ने का हौसला दे रही है।

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हम हौसले की बात इसलिए कर रहे हैं, कि हमारे बीच तमाम कैंसर रोगी हैं जो जिनकी आंखों में हार और लाचारी नजर आती है। ऐसे लोग हमारे समाज में भी हैं और हमारे समाज से बाहर भी। आगरा में ही ट्रांसयमुना निवासी मनोज शिवहरे के दुखद निधन की घटना ने हमे सोचने पर मजबूर किया है कि क्या कैंसर का होना सचमुच मौत का सर्टिफिकेट है। लेकिन, रमेश चौकसे और रूबी अहलुवालिया के अनुभव हमें बताता है कि जिंदगी की संभावनाएं किसी भी स्थिति में खत्म नहीं होतीं। हम ही हार मान लें, तो बात अलग है वरना कैंसर को भी मात दी जा सकती है, बस हौसला चाहिए। 

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