January 12, 2026
शिवहरे वाणी, D-30, न्यू आगरा, आगरा-282005 [भारत]
समाचार

मां ब्रह्मचारिणी का संदेश..कठिन संघर्षों में भी कभी मन विचलित न करें

नवरात्र के दूसरे दिन द्वितीया को माता के ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि देवी ब्रह्मचारिणी की पूरे विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों को कई तरह के लाभ होते हैं। सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि भक्त का मन हमेशा शांत एवं प्रसन्न रहता है। मां ब्रह्मचारिणी का संदेश है कि जीवन के कठिन संघर्षों में कभी मन विचलित नहीं करना चाहिए ।

धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्वजन्म में देवी ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। तब उन्हें शैलपुत्री कहा गया था। अपने दूसरे जन्म में नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी ब्रह्मचारिणी ने घोर तपस्या की थी। देवी ब्रह्मचारिणी एक हजार वर्षों तक केवल फल-फूल पर ही रहीं। उन्होंने खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के कष्ट सहे, जिसके चलते देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। तब भगवान शिव जी प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि अगले जन्म में वह उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे। 
देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन आदि से होती है। पूजन विधि यह है कि आप देवी ब्रह्मचारिणी की तस्वीर को पहले दूध, दही, घृत, मधु व शर्करा स्नान कराएं। इसके बाद देवी जी को पिस्ते की बनी मिठाई भोग में चढ़ाएं। 

पूजा के साथ ही देवी जी का मंत्र भी जपना चाहिए। और, पूजा के पश्चात मंत्र जाप का विशेष  महत्व होता है। मां ब्रह्मचारिणी के खास मंत्र इस प्रकार हैः-
– ॐ देवी ब्रह्मचारिणी नमः॥
– या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
– दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

आप मंत्र जाप के साथ ही माता का स्रोत पाठ भी पढ़ सकते हैं जो इस प्रकार है …
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥
“मां ब्रह्मचारिणी का कवच”
त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के नियम
– मां ब्रह्मचारिणी की उपासना के समय पीले या सफेद वस्त्र पहनें।
– मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करें जैसे- मिश्री, शक्कर या पंचामृत।
– ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ पर ज्योति का ध्यान करें या उसी चक्र पर अर्ध चन्द्र का ध्यान करें।
– मां ब्रह्मचारिणी के लिए “ऊं ऐं नमः” का जाप करें और जलीय और फलाहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के बाद पूरे विधि-विधान से उनकी आरती की जाती है, जो इस प्रकार है …
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला लेकर। जपे जो मंत्र श्रद्धा देकर।
आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी
 

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