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सोच बदलो..जमाना बदल रहा है; रामदेव कलाल की पगड़ी रस्म में बेटी श्यामा बाई की दस्तारबंदी; सात बेटियों ने समाज को दी नई रोशनी

बूंदी। 
राजस्थान के बूंदी में हिंडोली के 95 वर्षीय रामदेव कलाल की मृत्यु के बाद उनकी सात पुत्रियों ने समाज के सामने रस्मो-रिवाज के अंधेरों से निकलकर नई रोशनी में आने की मिसाल पेश की है। रामदेव के अवसान के बाद बेटियों ने उन सभी रस्मों को अदा किया जो एक पुत्र को करनी होती है। और, जब पगड़ी का आखिरी रस्म अवसर आया तब सबसे छोटी पुत्री श्यामाबाई ने अपनी दस्तारबंदी कराई।
बता दें कि हिंडोली के बाबाजी का बरड़ा में 95 वर्षीय रामदेव कलाल की मृत्यु बीती 24 जनवरी को हो गई थी। रामदेव कलाल का पुत्र नहीं था, लिहाजा उनकी सातों पुत्रियों कमला,  मोहिनी,  गीता,  मूर्ति,  पूजा,  श्यामा और ममता ने उनका अंतिम संस्कार किया था। बेटियो ने पिता के तिये नई आदि कार्यक्रम समाज के रीतिरिवाज के अनुसार आयोजित किए।  आखिरी रस्म फाग (रस्म पगड़ी) की  होती है जिसमें पुत्र को पगड़ी बांधी जाती है। पगड़ी की रस्म का अर्थ होता है परिवार के मुखिया के निधन के बाद पगड़ी के जरिये जिम्मेदारी का अंतरण। पगड़ी को इंसान के रुतबे और इज्जत का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब भी पगड़ी सम्मान के लिए आगे बढ़ी, उसने दस्तार के लिए बेटो के माथे का ही वरण किया है। संभवतः इसीलिए पिता की मृत्यु के बाद बेटों के पगड़ी पहनने ने एक रस्म का रूप ले लिया। लेकिन, रामदेव कलाल ने जिन सात बेटियों को बेटों की तरह पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया, उन बेटियों ने तय किया कि उनकी सबसे छोटी बहन श्यामा बाई पगड़ी पहनेगी।
फाग रस्म में समाजबंधुओं ने समाज के रीतिरिवाज के अनुसार श्यामाबाई के सिर पर पगड़ी बांधी। उसके बाद सभी बहनों ने चौकी के बाला जी के दर्शन किए। इस अवसर पर समाज के प्रबुद्ध व्यक्ति भी साथ रहे। समाज बंधुओं ने बताया कि पुरानी परंपराओं को तोड़कर वर्तमान के अनुसार समाज को दिशा देनी आवश्यक है। पुत्र और पुत्री में कोई अंतर नहीं होता। और वैसे भी, अब वह दौर है जब बेटियों घर से बाहर निकल रही हैं, बेटों की तरह काम करती हैं और परिवार जिम्मेदारियां निभाती हैं। कार्यक्रम में बूंदी, भीलवाड़ा, टोंक, कोटा ,अजमेर, सवाई माधोपुर, बारां के जिलों से समाजबंधुओं ने भाग लिया। 
 

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