शिवहरे वाणी नेटवर्क
उदयपुर।
राजस्थान में अरावली पर्वतमाला के बीच नागदा नगरी में सहस्त्रबाहु मंदिर भारतीय संस्कृति और कला का नायाब नमूना होने के साथ ही भारतीय इतिहास का झरोखा भी है। अब सास-बहू का मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर की नक्काशीदार दीवारों और खांचों वाली मेहराबों की अष्टकोणीय संरचना पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन, अफसोस…उचित देखभाल और संरक्षण नहीं होने के चलते कलचुरी समाज की इस गौरवपूर्ण विरासत पर खतरा मंडराने लगा है। मंदिर से भगवान सहस्त्रबाहु की दुर्लभ प्रतिमा भी गायब है। अच्छी बात यह है कि कलचुरी समाज ने अब इस मंदिर को गोद लेकर इसके संरक्षण और मूर्ति स्थापना की जिम्मेदारी लेने की पहल की है।
बीते दिनों कलचुरी कलाल समाज प्रतिनिधियों ने उदयपुर का दौरा कर इस अदभुत विरासत का अवलोकन किया और इसकी बिगड़ती हालत पर चिंता जताई। दसवीं शताब्दी में बना यह भव्य मंदिर नागदा टाउन में राष्ट्रीय राजमार्ग-8 पर उदयपुर से 23 किमी की दूरी पर है। बताया जाता है कि यहां पहले मूल रूप से भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था। यह 10 वीं सदी में मेवाड़ राजवंश में राजा महापाल के शासनकाल में राजघराने की राजमाता ने यहां विष्णु का मंदिर तथा बहू ने शेष नाग के मंदिर का निर्माण कराया। सास-बहू के द्वारा निर्माण कराए जाने से इन मंदिरों को सास-बहू के मंदिर के नाम से भी पुकारा जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यहा भगवान सहस्रबाहु की दुर्लभ प्रतिमा विराजमान थी, सहस्रबाहु को भगवान विष्णु का ही अवतार माने जाते है।
यहां पहुंचे कलचुरी समाज प्रतिनिधिमंडल के संयोजक देवीलाल चौधरी ने बताया कि स्थानीय ग्रामीण सहस्त्रबाहु का उच्चारण करने में असहज थे। साथ ही समय के साथ हुए बदलाव से सहस्त्रबाहु मंदिर का नाम सास बहू मंदिर हो गया। समन्वयक सूर्य प्रकाश सुहालका ने बताया कि ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व लिए वहां निर्मित करीब 12 में से 9 मंदिर लगभग नष्ट हो चुके हैं, जिनमें 9 मंदिर मां दुर्गा के नौ रूपों के थे, लेकिन वहां स्थित सहस्त्रबाहु मंदिर, शिव मंदिर और सूर्य मंदिर के बेशकीमती अवशेषों को अभी भी संरक्षित रखा जा सकता है। अध्यक्ष लोकेश चौधरी ने बताया कि कलचुरी समाज का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है और इस सहस्त्रबाहु मंदिर के साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष के कलाल समाज के सदस्यों की श्रद्धा जुड़ी हुई है। इधर, वरिष्ठ संरक्षक रतनलाल पूर्बिया के साथ जवाहर लाल चौधरी, सोहनलाल सुहालका, भैरूलाल कलाल, लक्ष्मीनारायण सुहालका ने पुरातत्व विभाग के प्रतिनिधि से समस्त जानकारी लेकर रिकॉर्ड प्राप्त किया और अग्रिम कार्ययोजना बताई।
मंदिर दो संरचनाओं में है। एक संरचना सास का मंदिर कही जाती है जिसमें मंदिर के प्रवेश द्वार नक्काशीदार छत और बीच में कई खाँचों वाली मेहराब हैं। एक वेदी, एक मंडप (स्तंभ प्रार्थना हॉल), और एक पोर्च मंदिर के दोनों संरचनाओं की सामान्य विशेषताएं हैं। दूसरी संरचना 'बहू' का मंदिर है, जो सास मंदिर से थोड़ा छोटा है। इसमें एक अष्टकोणीय आठ नक्काशीदार महिलाओं से सजाया छत है। एक तोरण (मेहराब) 'सास' मंदिर के सामने स्थित है। मंदिर की दीवारों को रामायण महाकाव्य की विभिन्न घटनाओं के साथ सजाया गया है। मूर्तियों को दो चरणों में इस तरह से व्यवस्थित किया गया है कि एक दूसरे को घेरे रहती हैं। मंदिर में भगवान ब्रह्मा, शिव और विष्णु की छवियों को एक मंच पर खुदी हैं और दूसरे मंच पर राम, बलराम, और परशुराम के चित्र खुदी हैं।
समाचार
उदयपुर के ऐतिहासिक सहस्त्रबाहु मंदिर को संभालेगा कलचुरी समाज..स्थापित होगी मूर्ति
- by admin
- October 29, 2016
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- 9 years ago








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