शिवहरे वाणी नेटवर्क
खंडवा।
हम हिंदुओं में लकड़ी से शव का अंतिम संस्कार करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। घटते जंगलों और बढ़ते प्रदूषण को लेकर विश्वव्यापी चिंता के बीच ऐसी जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है कि शवदाह अब लकड़ी के बजाय किसी अन्य उपाय से हो। कई शहरों में विद्युत शवदाहगृह बनवाए गए हैं लेकिन इसे अभी तक आम स्वीकार्यता नहीं मिली है। ऐसे में खंडवा के एक कलचुरी परिवार ने ऐसी पहल की है जिसकी जंगलों और प्रदूषण को तो बचाएगी ही, उसकी स्वीकार्यता में भी कोई बाधा नहीं होगी।
मध्य प्रदेश में खंडवा के कलचुरी परिवार की माताजी के निधन के बाद उनके शव का अंतिम संस्कार लकड़ियों के बजाय कंडों से किया गया । खंडवा में महावीर कालोनी की श्रीमती कलावती बाई जायसवाल का निधन बीते शनिवार 24 दिसंबर की रात हो गया था। उनके पुत्रगण मनोज, अनिल और सुनील जायसवाल ने मां का अंतिम संस्कार लकड़ी की जगह कंडे से करने की इच्छा जताई।
पुत्रों ने इसके लिए खंडवा की मानव सेवा समिति से संपर्क किया। समिति ने पूरा सहयोग किया और सदस्यों ने श्मशान घाट पर राधाकृष्ण गौशाला से गाय के गोबर से बने कंडे पहुंचा दिए। रविवार को इन्हीं कंडों से माताजी काअंतिम संस्कार किया गया। लकड़ी का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं किया गया।
अंतिम संस्कार में लकड़ी के बजाय कंडे का उपयोग करने के कई बड़े फायदे हैं। पहला तो यह, कि इससे जंगलों की कटाई पर रोक लग पाएगी। एक दाह संस्कार में 3 से 4 कुंटल लकड़ी लगती है और करीब 5000 रुपये का खर्चा आता है। वहीं इसमें केवल 600-700 कंडे ही लगते हैं, जिनकी लागत 2000 रुपये से अधिक नहीं होती। इस तरह दूसरा लाभ परिवार पर आर्थिक बोझ कम होने के रूप में सामने आता है।
तीसरा लाभ यह कि गाय के गोबर से बने कंडों का धुआं, लकड़ी के धुएं से कम जहरीला होता है। यही नहीं, कंडे जलाने से आसपास के वातावरण में फैले विषाणु (एअरबॉर्न बैक्टीरिया) नष्ट हो जाते हैं। बताते हैं, लकड़ी की तुलना में गोबर से कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम होता है। कुल मिलाकर लकड़ी के बजाय कंडे से शवदाह करने पर वायु प्रदूषण भी कम होगा।
चौथा बड़ा फायदा यह है कि कंडे से शवदाह का प्रचलन गौवंश को और अधिक उपयोगी बनाएगा जिससे सीधे तौर पर गौवंश के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा। गोबर की काष्ठ यानी लकड़ी भी बनाई जाने लगी है। कंडे से अंतिम संस्कार की स्वीकार्यता मिलने पर गोबर की लकड़ियों का प्रयोग भी हो सकता है।
पांचवां फायदा यह है कि कंडे की राख नदियों को साफ करने में अहम योगदान कर सकती है। हिंदुओं में शवदाह के बाद राख (जिन्हें फूल या अस्थियां कहते हैं) को नदियों में बहाने की परंपरा है। देश की प्रदूषित होती नदियों के जल में अब तरह-तरह के रसायन पाए गए हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि कंडे की राख से नदियों के पानी को साफ किया जा सकता है।
समाचार
कलचुरी परिवार की पहल..इस तरह शवदाह कर बचाएंगे जंगल..पर्यावण..गौवंश और नदियां
- by admin
- October 29, 2016
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- 9 years ago








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