शिवहरे वाणी नेटवर्क
ग्वालियर
आजकल विद्यार्थियों के जीवन में ध्यान और योग के महत्व पर बहुत सी बातें हो रही हैं। निःसंदेह ध्यान और योग करने से आत्मविश्वास बढ़ता है, साथ ही लेखन, स्मृति और सोचने की क्षमता में भी इजाफा हो सकता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है अपने लक्ष्य के प्रति विद्यार्थी का संकल्प। विद्यार्थी यदि अपने पर ध्यान-केंद्रित किए हुए है और उसे प्राप्त करने की साधना (सही दिशा में प्रयास) में लीन है, तो उसे इसका वही प्रतिफल प्राप्त होगा जो योग और ध्यान क्रिया से प्राप्त होना संभव है। इस बात को स्थापित किया है श्रीमती विजयलक्ष्मी शिवहरे ने अपनी शोध में, जिसके लिए जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर ने उन्हें डाक्टरेट यानी पीएचडी अवार्ड की है।
श्रीमती विजयलक्ष्मी जायसवाल के शोध का विषय था, 'विद्यार्थी के व्यक्तित्व विकास एवं शैक्षणिक उपलब्धियों पर ध्यान एवं योग का प्रभाव' (ग्वालियर नगर के शासकीय वं अशासकीय माध्यमिक विद्यालयों के संदर्भ में)। यूं तो इससे संबंधित विषयों पर कई पीएचडी हो चुकी हैं। लेकिन श्रीमती विजयलक्ष्मी जायसवाल व्यापक औऱ तुलनात्मक सर्वेक्षण कर जिस निष्कर्ष पर पहुंची हैं, वह अपने आपमें खास है। ऐसे वक्त जब बच्चों में योग और ध्यान क्रियाओं के लिए प्रेरित करने के प्रयास सरकारी स्तर पर हो रहे हैं, श्रीमती जायसवाल का यह शोध और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
जैन डिग्री कालेज ग्वालियर की प्रोफेसर (श्रीमती) कमलेश सिंह के मार्गदर्शन में किए अपने शोध के लिए श्रीमती विजयलक्ष्मी ने शासकीय और गैर शासकीय (कान्वेंट व प्राइवेट) स्कूलों के करीब 800 बच्चों के डेटा एकत्र किया और उनका गहन तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जो बच्चे प्रतिदिन ध्यान और योग करते हैं, उनकी उपलब्धियों का स्तर उन बच्चों के ही बराबर है जो योग और ध्यान तो नहीं करते लेकिन एकाग्र होकर अपने लक्ष्य पर बढ़ने का प्रयास करते हैं, उसके लिए मन लगाकर मेहनत करते हैं। उनका कहना है कि जो बच्चे योग और ध्यान नहीं कर पाते हैं, उनके लिए इतना ही काफी है कि वे अपना लक्ष्य निर्धारित करें और पूरे मनोयोग से उसे प्राप्त करने में जुट जाएं।
श्रीमती विजयलक्ष्मी ने बताया कि शोध में उन्होंने पाया कि स्कूलों में योग और ध्यान के पीरियड होते तो हैं लेकिन उनके ठीक तरीके से काम नहीं हो रहा है यानी ज्यादातर टीचर्स या तो ठीक तरीके से योग प्रशिक्षित नहीं हैं अथवा ठीक तरीके से योग सिखा नहीं पाते है। वहीं, जो बच्चे ठीक तरीके से योग और ध्यान सीख पा रहे हैं, उनके जीवन में परिवर्तन आया है। उनका कहना है कि स्कूल स्तर पर बच्चों को योग और ध्यान सिखाने के सरकारी प्रयासों के सकारात्मक परिणाम तभी निकलेंगे, जब योजना उचित तरीके से लागू हो। मसलन टीचर्स को योग ट्रेनिंग दी जाए, योग क्लास की मंथली रिपोर्ट स्कूल प्रबंधन द्वारा ली जाए, अच्छा काम करने वाले टीचर्स को वेतनवृद्धि जैसे प्रोत्साहन दिए जाएं।
शिवहरे वाणी इस उपयोगी शोध के लिए श्रीमती विजय लक्ष्मी शिवहरे को बधाई देती है। उम्मीद है कि हमारी सरकारों के लिए यह शोध आई-ओपनर का काम करेगा। ग्वालियर में गणपति विहार में परिवार के साथ रह रहीं श्रीमती विजयलक्ष्मी का यह शोध इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्होंने इस आयु में शोध कर एक मिसाल पेश की है और समाज की अन्य महिलाओं अपने पसंदीदा क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का काम किया है। वह चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो. फैशन का या फिर कोई भी अन्य पसंदीदा क्षेत्र, उस क्षेत्र में आगे बढ़ने की पहल कभी भी और उम्र के किसी भी पड़ाव पर की जा सकती है।
श्रीमती विजयलक्ष्मी ने करीब 25 साल पहले राजनीतिक विज्ञान और फिर हिंदी में स्नातकोत्तर किया। श्री बसंत जायसवाल से विवाह के बाद परिवार संभालने में जुट गईं। बच्चे कुछ बड़े हुए तो बीएड और एमएड की डिग्री हासिल की। उसके बाद बीएड की क्लासेज लेनी शुरू कीं। और, अब अपनी मेहनत से नया मुकाम हासिल कर बन गई हैं 'डाक्टर' श्रीमती विजय लक्ष्मी जायसवाल। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा मंथन जायसवाल इस समय नोएडा स्थित जेपी इंस्टीट्यूट से बीटेक (सीएस) कर रहा है। छोटे बेटे ने सीबीएसई बोर्ड से इंटरमीडियेट में 86 प्रतिशक अंक प्राप्त किए हैं और अब कंप्टीशन की तैयारी में जुटा है। इस शोध के बाद श्रीमती जायसवाल शिक्षण क्षेत्र में और आगे बढ़ना चाहती हैं।
वुमन पॉवर
डा. विजयलक्ष्मी जायसवाल ने शोध के बहाने सरकारों को दिखाया सच का आइना
- by admin
- October 29, 2016
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