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शाही सवारी सी निकली पूरनचंद चौकसे की शवयात्रा; सड़कें धोईं, गुलाब बिछाए और छिड़का इत्र

शिवहरे वाणी नेटवर्क
विदिशा। 
जाने-माने समाजसेवी एवं कारोबारी पूरनचंद चौकसे ने कभी अपने बेटों से दिली इच्छा जाहिर की थी, कि मेरी मृत्यु पर शोक नहीं मनाया जाए, और अंतिम यात्रा इतनी धूमधाम से निकाली जाए, कि लोग याद रखें। पुत्रों ने वियोग के दु;ख को भुलाकर पिता की इच्छा पूरी की। पूरनचंद चौकसे की अंतिम यात्रा इतनी धूमधाम से निकाली गई कि लोग बरसों-बरस याद रखेंगे। चौकसे ने अपनी अंतिम यात्रा को लेकर ऐसी इच्छा क्यों जाहिर की, वह ऐसा क्यों चाहते थे? इन सवालों के जवाब तो उनके साथ ही चले गए। लेकिन इस तरह वह अपने पुत्रों को दुःखों पर विजय पाने का हुनर दे गए जो ‘सुखमय जीवन’ का मूलमंत्र है।
63 वर्षीय पूरनचंद चौकसे को कुछ समय पहले किडनी संबंधी बीमारी ने चपेट में ले लिया था, जिसके चलते बीती 16 जनवरी को उनका निधन हो गया। अगले दिन सुबह दस बजे मालवीय उद्यान के समीप चौकसे विला से पूरनचंद चौकसे की अंतिम यात्रा निकाली गई। यात्रा में सबसे आगे पानी से भरे टैंकर सड़क की धुलाई करते हुए चल रहे थे। टैंकरों के पीछे गुलाबों से भरी गाड़ी धुली सड़कों पर बिछाती चल रही थी और, इसके पीछे कुछ लोग गुलाब के फूलों से अटी सड़क पर इत्र छिड़कते चल रहे थे। उज्जैन और भोपाल से बुलाए गए मंजीरे वाले मंजीरे बजाते जा रहे थे। 
यात्रा करीब एक किलोमीटर का फासला तय कर मुक्तिधाम पहुंची, जिसे सफेद और पीले फूलों से सजाया गया था। चंदन की लकड़ी से चिता सजाई गई थी। चौकसे के दोनों पुत्रों राहुल और राजुल ने चिता को मुखाग्नि दी। राहुल के मुताबिक तेरहवीं के दिन भी वे पिता की अंतिम इच्छा के अनुसार उनके पारिवारिक गांवों में पाइ चून (घर के पूरे सदस्यों) का न्यौता देंगे।
स्व. चौकसे के भतीजे प्रकाश ने शिवहरे वाणी को बताया कि चाचाजी का जीवन मिसाल रहा कि जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए। सफल कारोबारी थे लेकिन हमेशा सादगी का जीवन जिया। बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के क्षेत्र में राहत सामग्री पहुंचाने के काम में वह हमेशा बढ़-चढ़कर सक्रिय रहे। कलचुरी समाज की कई गरीब कन्याओं के विवाह भी उन्होंने कराए। 
 

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