शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा।
आगरा में शिवहरे समाज के पास दाऊजी मंदिर के रूप में बुजुर्गों की एक ऐसी धरोहर है जिस पर अन्य किसी भी समाज को रश्क हो सकता है। क्योंकि, आगरा ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत में लाल पत्थर पर ऐसा कलात्मक शिल्प शायद ही कहीं और देखने को मिले। पत्थर पर डिजाइन इतनी महीन है और कटिंग इस कदर नाजुक है कि जरा सा भी बाहरी प्रेशर इसे बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। गनीमत है कि अब तक हमने इस धरोहर को संजोए रखा लेकिन अब जाने-अनजाने में अपने ही लोगों की अनदेखी और उपेक्षा इस धरोहर के लिए बड़ा खतरा बन गई है।

एक अफसोसनाक नजारा सामने आया इस दिवाली पर। लंबे समय से मंदिर के प्रवेश द्वार के पास हलवाई की दुकान चला रहे स्वजातीय बंधु कमाई के चक्कर में धरोहर के प्रति सम्मान और कर्तव्य तक भूल गए। उन्होंने दीवाली पर अपनी दुकान फैलाने के चक्कर में अपने तख्त मंदिर के कलात्मक शिल्प से सुसज्जित दीवार से सटा कर लगा दिए। यही नहीं, प्रवेश द्वार के ठीक ऊपर पत्थर में ही डिजाइन किए गए कुंडे में अपना तंबू बांध दिया। जैसा कि चित्र में आपको दिखाई दे रहा है।

बेशक तंबू का वजन इतना नहीं कि सामान्य स्थिति में कुंडे और दीवार को नुकसान हो सके। लेकिन तेज हवा या आंधी जैसी स्थिति में इसके क्षतिग्रस्त होने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। यह तंबू छोटी दिवाली की रात से इस कुंडे पर बंधा हुआ है। रविवार को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट समारोह में शिवहरे वाणी का यह संवाददाता दाऊजी मंदिर पहुंचा तो नजारा देखकर चौंक गया।
जानकारी करने पर यह भी पता चला कि मंदिर प्रबंध समिति के पदाधिकारियों ने भी इस बात पर कोई गौर नहीं किया था। मंदिर के पुजारी ने, या किसी जिम्मेदार पदाधिकारी ने हलवाई को कुंडे से तंबू बांधते वक्त टोका तक नहीं। और तो और, दो दिन बाद भी इस ओर उनका ध्यान नहीं गया।

हलवाई की लापरवाही भी गजब की है। छोटी दिवाली और फिर बड़ी दिवाली को यहां टेंट-तंबू लगाकर और अपने तख्तों को दुकान की हद पार कर मंदिर के मुख्य द्वार तक फैलाकर मिठाई बेचने वाले इस हलवाई ने रविवार को दुकान बंद रखी थी लेकिन अगले दिन भाई दौज की दुकानदारी करने के वास्ते उसने न तो तख्त वहां से हटाए और ना ही कुंडे मं बंधे तंबू को हटाया।

जरा सोचिये, इस तरह की लापरवाहियां हुईं तो हम आखिर कब तक अपनी धरोहर को महफूज रख सकते हैं। बुजुर्गों द्वारा कराए गए कार्य के शिल्प की महानता को इसी से समझा जा सकता है कि हम आज तक इस दीवार की सफाई तक नहीं करा सके हैं। एक-दो बार विभिन्न प्रबंध समितियों ने ऐसा प्रयास भी किया लेकिन काम इतना बारीक है कि सफाई के लिए जरूरी जरा से प्रेशर से ही इसे नुकसान होने लगा। लिहाजा काम तत्काल बंद कराना पड़ा। दुर्भाग्य से यदि इस दीवार के कलात्मक शिल्प को जरा भी नुकसान हो गया, तो उसकी भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा।

मंदिर को बुजुर्गों की धरोहर बताने वाले, उसके संरक्षण की जिम्मेदारी उठाने वाले मंदिर प्रबंधन को इस ओर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही, ऐसे कदम उठाने की जरूरत है कि भविष्य में ऐसी गलती और लापरवाही की पुनरावृत्ति न हो।

आपको बता दें कि स्वतंत्र भारत में जब पुरातत्व संरक्षण विभाग का गठन हुआ था तो इस मंदिर को भी विभाग के अंडर में लेने की बात सरकार द्वारा कही गई थी। लेकिन, तब हमारे बुजुर्गों ने सरकार को इसके संरक्षण का भरोसा दिलाते हुए ऐसा नहीं होने दिया था। आज भी तमाम पर्यटक, कला-प्रेमी और शिल्प के जानकार व छात्र इस बेजोड़ शिल्प को देखने के लिए मंदिर आते हैं।













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