नई दिल्ली।
कोरोना के चलते देशव्यापी लॉकडाउन से लोगों के काम-धंधे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। हजारों लाखों परिवारों के सामने आज भी रोजी-रोटी का गंभीर संकट है। ऐसे में कुछ कहानियां सामने आती हैं जो इन हालात में हौसला बंधाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है दिल्ली की गीता जायसवाल की।
43 वर्षीय गीता जायसवाल का टिफिन का कारोबार लॉकडाउन के चलते पूरी तह बंद हो गया था। लेकिन, इसके बाद उसने एक ऐसी शुरूआत की, कि तीन महीने के अंदर ही कम से कम 4500 रुपये रोज की कमाई बना ली है। गीता जायसवाल मूल रूप से इलाहाबाद की रहने वाली है। गीता के पति (नाम नहीं बताती) ने परिवार की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया था। ऐसे में बूढ़ी सास और जवान होती बेटी के पालन-पोषण का गंभीर संकट खड़ा हो गया।
वर्ष 2016 को गीता काम की तलाश में अपनी सास और बेटी को लेकर दिल्ली में अपनी बहन शोभा के पास आ गई। शालीमार बाग इलाके में किराये की खोली ली, और काम की तलाश में जुट गई। औपचारिक स्कूली शिक्षा प्राप्त गीता को काम तो मिले लेकिन पैसा इतना कम था कि ठीक से परिवार चला पाए। ऐसे में गीता ने पहले-पहल शालीमार बाग इलाके में ही ब्रेड पकोड़े और लिट्टी-चोखा का एक छोटा सा स्टाल लगाया। हालांकि स्टाल इतना नहीं चला कि उसकी कमाई से परिवार की जरूरतों को पूरा कर पाती। फिर भी, वह इतना तो जान चुकी थी कि फूड के क्षेत्र में वह कुछ कर सकती है।
तमाम संघर्षों से गुजरते हुए अंत में गीता ने एक लाइन तलाश ही ली। शालीमार इलाके में यूपीएससी की तैयार कर करने वाले हजारों स्टूडेंट रहते थे। परिवार से दूर रहने के चलते घर का बना शुद्ध भोजन उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी, जिसे गीता ने पहचाना और करीब डेढ़ साल पहले टिफिन सर्विस शुरू कर दी। काम चल निकला। वह सुबह के नाश्ते, दोपहर और रात के भोजन के टिफिन इन स्टूडेंट्स को सप्लाई करने लगी। लॉकडाउन से पहले तक वह 70 टिफिन सप्लाई कर रही थी और उसकी कमाई ठीक-ठाक थी। दुर्भाग्य से कोरोना महामारी के चलते मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन लागू हो गया। स्टूडेंट्स अपने-अपने घर चले गए। गीता का काम पूरी तरह बंद हो गया और उसके सामने एक बार फिर गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया।
लॉकडाउन की बेकारी को आखिर कब तक झेलती। लॉकडॉउन के आखिरी दिनों में गीता ने अपने घर के बाहर एक छोटी सी इडली की स्टाल लगानी शुरू की । गीता का कहना है कि मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय इसके कि काम करुं। पति का साथ होता तो शायद घर पर रहती। इडली एक ऐसी डिश है जिसे बच्चे-बूढ़े सभी पसंद करते हैं, सो मैंने इसकी स्टाल लगा ली।
आज गीता की इडली इलाके में फेमस हो चुकी है। स्टाल का नाम है मिसेज इडली। गीता दिनभर 4500 रुपये की इडली बेच लेती है, और इतना कमा लेती है कि परिवार का भरण-पोषण और बेटी की पढ़ाई ठीक-ठाक चल रही है। अभी पैसा तो नहीं बचा पाती, लेकिन उसे उम्मीद है कि आने वाले दिनों में काम और बढ़ेगा, तो बरक्कत भी होगी।
वैसे अब गीता ने स्टाल पर डोसा बनाना भी शुरू कर दिया है। वह इडली और डोसे के साथ सांभर के अलावा दो प्रकार की चटनी परोसती है। एक नारियल चटनी औऱ दूसरी वेजिटेबल चटनी। उसकी एक प्लेट में दो इडलियां होती हैं, कीमत है 30 रुपये। मसाला डोसा की प्लेट 60 रुपये की है। वह शाम को 5.30 बजे स्टाल शुरू करती है जो रात 10.30 तक चलता है। गीता अपनी उपलब्धि के लिए बहन शोभा जायसवाल का आभार जताती है जो उसके साथ हर मुश्किल में खड़ी रही।
वह मुस्कराते हुए कहती है कि व्यक्ति को मेहनत और ईमानदारी का कोई भी काम करने में शर्म नहीं करनी चाहिए। मैं ईश्वर की आभारी हूं कि उसने लोगों को भोजन कराने का काम मुझे दिया, जिसकी बदौलत मैंअपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दिला पा रही हूं।