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श्रद्धांजलिः प्रेरित करती रहेगी इंजी. कुलपाल सिंह की दरियादिली और युवा-ऊर्जा

यूं लग रहा है कि अभी लौट आएगा
जाने वाला चराग बुझाकर नहीं गया।
मां विध्यवासिनी के लाल इंजी. कुलपाल सिंह (जायसवाल) के आकस्मिक निधन ने सभी को स्तब्ध कर दिया है। कैसे भरोसा करे कोई, कि जो शख्स मौत से दस दिन पहले वाराणसी में अखिल भारतीय जायसवाल समवर्गीय महासभा के मंच पर दो-खंड संगठन के एकीकरण के प्रयास में अहम भूमिका निभा रहा था, वह होली पर अपना खालीपन छोड़ जाएगा। इंजी. कुलपाल सिंह आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन स्वजातीय समाज के हितकार्यों में उनकी तत्परता, दरियादिली और 82 वर्ष की आयु में भी उनकी युवा-ऊर्जा लोगों को प्रेरित करती रहेगी।
होली की सुबह इंजी. कुलपाल सिंह अपने घर के बाहर सड़क किनारे खड़े थे, तभी वहां से गुजर रहे एक बाइक सवार लड़के पर किसी शरारती बच्चे ने रंग भरा गुब्बारा फेंका। गुब्बारा तेजी से आकर बाइक सवार के सिर से टकराया जिससे वह वाहन से नियंत्रण खो बैठा, और बाइक पास खड़े इंजी. कुलपाल सिंह से जा टकराई। हादसे में इंजी. कुलपाल सिंह बुरी तरह घायल हो गए, उनका सिर वहां जमीन पर पत्थर जैसी किसी ठोस चीज से टकराया और वह अचेक होकर वहीं गिर पड़े। घर में मौजूद उनके पुत्र इंजी आशीष सिंह उन्हें तत्काल मिर्जापुर के एक अस्पताल ले गए जहां से उन्हें वाराणसी रैफर कर दिया गया। वाराणसी में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन की सूचना से कलवार समाज में शोक की लहर दौड़ गई। लोग होली के रंग छोड़ अपने प्रिय इंजी. कुलपाल सिंह को अंतिम विदाई देने के लिए पहुंचने लगे।
1942 में जन्मे इंजी. कुलपाल सिंह विंध्याचल (मिर्जापुर) के एक धनाड्य कलवार परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता स्व. केदारनाथ वैद्यजी भी अपने दौर के एक प्रतिष्ठित समाजसेवी थे, अक्षय पैतृक संपत्ति व प्रचुर धन-दौलत का गुरुर उन्हें छूकर भी नहीं गया था। पिता की विनम्रता, सरलता और दरियादिली को इंजी. कुलपाल सिंह ने व्यक्तित्व का गहना बना लिया था। इंजी. कुलपाल सिंह ने शिक्षा के बाद सिंचाई विभाग में नौकरी की और 38 वर्ष पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा प्रदान करते हुए वर्ष 2002 में वह रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद वह पूरी तरह सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए थे। वर्तमान में वह जायसवाल समाज उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे, अखिल भारतीय जायसवाल समवर्गी महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष भी थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने विंध्याचल में पुश्तैनी घर को अपना ठिकाना बना लिया था जो मां विध्यवासिनी मंदिर से 200 कदम की दूरी पर है। जीवनसंगिनी श्रीमती ऊषा सिंह संग नित्य प्रातः मां विंध्यवासिनी के दर्शन करना, और मां के दर्शनार्थियों की सेवा व सहायता करना उनकी दिनचर्या थी। यहां वह अपने बड़े पुत्र इंजी. आशीष सिंह, पुत्रवधु व नाती-पोते के साथ रहते थे। आशीष सिंह विंध्याचल में ही अपना होटल ‘विंध्य रेजीडेंसी’ संचालित करते हैं। वहीं छोटे पुत्र डा. अंबरीश सिंह उरई (जालौन) में मेडिकल ऑफीसर के पद पर हैं। पुत्री भारती सिंह और दामाद हरीश गुप्ता बंगलुरू में रहते हैं। इंजी. आशीष सिंह ने शिवहरेवाणी को बताया कि 82 वर्ष की आयु में भी उनके पिता कोई दवा या टेबलेट नहीं लेते थे। प्राणायाम और योगासन उनकी दिनचर्या का सबसे अहम हिस्सा था। पारिवारिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद इंजी. कुलपाल सिंह ने अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था।
इंजी. कुलपाल सिंह प्रदेशभर में कलवार समाज के कार्यक्रमों में अक्सर सपत्नीक देखे जाते थे। बीते वर्ष हरिद्वार में स्वजातीय संत महामंडलेश्वर श्री संतोषानंद देवजी महाराज के अवधूत मंडल आश्रम में भगवान सहस्रबाहु अर्जुन की मूर्ति स्थापना समारोह में भी पहुंचे थे जहां देशभर से कलचुरी समाज की सम्मानित हस्तियां पहुंची थीं। इंजी. कुलपाल सिंह से इन सबकी सुखद मुलाकात हुई। अखिल भारतीय जायसवाल सर्ववर्गीय महासभा के संरक्षक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय कुमार जायसवाल (लखनऊ) उन्हें एक ऐसे स्नेही और सज्जन व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जो सभी से दोस्ताना व्यवहार करते थे और सामाजिक कार्यों में तन-मन-धन से कभी पीछे नहीं रहते थे। वह उनके निधन को समाज के लिए अपूर्णनीय क्षति मानते हैं। उत्तर प्रदेश जायसवाल सर्ववर्गीय महासभा के युवा अध्यक्ष श्री कपिल जायसवाल (कानपुर) इंजी. कुलपाल सिंह के निधन का समाचार मिलते ही विंध्यालय पहुंचे और चौबे घाट पर उनके अंतिम संस्कार में भाग लिया। उन्होंने शिवहरेवाणी को बताया कि अंतिम संस्कार में जुटी लोगों की भारी भीड़ सर्वसमाज में उनकी लोकप्रियता की गवाही थी। उन्होंने बताया कि इंजी. कुलपाल सिंह हर महीने उन्हें फोन करते, उनके परिवार की राजीखुशी पूछते और सामाजिक गतिविधियों की जानकारी लेते थे। वह उनके लिए गार्जियन की तरह थे। अखिल भारतीय जायसवाल समवर्गीय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालचंद गुप्ता (मुंबई) ने उन्हें निष्पाप हृदय के खुले विचारों वाले व्यक्ति के रूप में याद किया है।

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