वडोदरा।
हर इंसान में कुछ खासियतें होती हॆ, तो कुछ खामियां भी होती हैं। संसार में परफेक्ट कोई नहीं है, और कोई एब्नॉर्मल नहीं है। ‘सबके अपने-अपने नॉर्मल हैं।‘ हाल में रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म ‘सितारे जमीं पर’ यही संदेश देती है, जिसे फिल्म में काम करने वाले न्यूरो डायवर्जेंट बच्चों ने शानदार अभिनय कर साबित भी किया है। इन्हीं में एक कलाकार हैं वडोदरा की श्रुति गुप्ता (शिवहरे) जो डाउन सिंड्रोम से पीड़ित हैं।
दिल छू लेन वाली इस फिल्म में काम करने के लिए देशभऱ में न्यूरो डायवर्जेंट बच्चों के ऑडीशन लिए गए थे जिसके बाद कुल 150 बच्चों का चयन हुआ, और उनमें से भी 25 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के 10 बच्चे मुख्य भूमिकाओं में लिए गए। 24 वर्ष की श्रुति गुप्ता महज कम आयु के चलते मुख्य भूमिका से चूक गईं। फिल्म में श्रुति गुप्ता की भूमिका बहुत छोटी है, और अंतिम सीन में नजर आती हैं। फिल्म रिलीज हुई तो सिनेमाघर के बड़े पर्दे पर खुद को देख श्रुति गुप्ता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, और उससे भी ज्यादा खुश थीं उसकी मम्मी संचिता गुप्ता जिनकी सेवा, समर्पण और मेहनत ने श्रुति को सामान्य बच्चों की तरह जीने का हौसला दिया।
श्रुति के पिता नीरज गुप्ता इमीटेशन ज्वैलरी का बिजनेस करते हैं, मूल रूप से यूपी में टूंडला (फिरोजाबाद) के निकट ‘हट्टा का नगला’ गांव के रहने वाले हैं। जबकि, मम्मी संचिता गुप्ता आगरा में पीपलमंडी निवासी श्री रामबाबू गुप्ता की पुत्री हैं। संचिता गुप्ता ने शिवहरेवाणी को बताया कि फिल्म की ज्यादातर शूटिंग वडोदरा के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में हुई है। श्रुति का ऑडीशन भी वडोदरा में हुआ था। श्रुति इस फिल्म के अंतिम सीन में कोच बने आमिर खान के पास बैठकर अपनी टीम को चीयर करती नजर आती है।
संचिता कहती हैं कि उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी बच्ची ने कैमरे के सामने आमिर खान के साथ सहजता से अभिनय किया। उन्होंने बताया कि श्रुति डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है लेकिन व्यवहार औऱ बौद्धिक क्षमता के मामले में वह किसी सामान्य बच्चे से ज्यादा पीछे नहीं है। उन्होंने श्रुति को पहले एक साल स्पेशल स्कूल में भर्ती कराया था लेकिन एक साल बाद ही सामान्य स्कूल में उसका दाखिला करा दिया। आज वह इतना कुछ सीख चुकी है कि पिता के बिजनेस में हाथ बंटाती है, कंप्यूटर पर बिल बना लेती है और घर के काम में हाथ भी बंटाती है।
डाउन सिंड्रोम या किसी अन्य कारण से न्यूरो डायवर्जेंट बच्चों के बारे में समाज में गलत धारणाएं हैं, लोग इन बच्चों को ‘पागल’ या ‘मेंटल’ तक कहने में नहीं हिचकते, उनकी क्षमताओं को नजरअंदाज करते हैं। जबकि हकीकत यह है कि न्यूरो डायवर्जेंट बच्चे भी सीख सकते हैं, यह अलग बात है कि उनके सीखने गति कुछ धीमी होती है। संचिता ने बड़े धैर्य से श्रुति की ट्रेनिंग की और धीरे-धीरे इतना कुछ सिखा दिया कि आज वह आत्मनिर्भर जीवन जी रही है। फिल्म की कहानी में न्यूरो डायवर्जेंट बच्चों के जीवन में जो भूमिका उनके कोच आमिर खान की है, श्रुति के असल जीवन में वही भूमिका संचिता ने निभाई है। श्रुति जैसी बच्ची को और संचिता जैसी मां को एक सलाम तो बनता ही है।
क्या होता है डाउन सिंड्रोमः- डाउन सिंड्रोम एक सामान्य आनुवांशिक स्थिति है जो तब होती है जब बच्चे में गुणसूत्र-21 की एक अतिरिक्त प्रति होती है। यानी उसके पास 46 के बजाय 47 गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र हर मानव कोशिका के अंदर की सरचना है जिसमें डीएनए होता है। ऐसे बच्चों के शरीर और मस्तिष्क का विकास अलग तरह से होता है।
क्या होते हैं इसके लक्षणः इससे पीड़ित बच्चे शारीरिक रूप से कुछ अलग नजर आते हैं। इनमें ज्यादातर बहच्चों का सिर छोटा, चेहरा चपटा और गर्दन छोटी होती है, आंखों में ढेड़ापन नजर आता है। इन बच्चों में बौद्धिक विकलांगता होती है जो हल्के से लेकर मध्यम तक हो सकती है, इनमें सीखने की क्षमता धीमी होती है। इन बच्चों में थॉयराइड, मोटापा, हृदय दोष, दृष्टि-दोष, श्रवण हानि जैसी शारीरिक समस्याओं का खतरा हमेशा बना रहता है।
क्या है इसका उपचारः– डाउन सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है। लेकिन यही शुरुआत में ही समस्या को पहचानकर चिकित्सकीय देखभाल के साथ उपयुक्त ट्रेनिंग दी जाए तो ऐसे बच्चे स्वस्थ और सामान्य तरीके से पूर्ण जीवन जी सकते हैं।
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