पवन नयन जायसवाल
कलाल जाति, भगवान श्री सहस्रार्जुन को अपना पितृ पुरुष और आराध्य मानने वाली क्षत्रिय वर्ण के हैहयवंश की एक प्रमुख जाति है। सनातन हिंदू धर्म की यह जाति संपूर्ण भारत के सभी राज्यों में निवास करती है। कलाल जाति का मुख्य व्यवसाय खेती के साथ मदिरा का उत्पादन और व्यापार करना भी रहा है इसलिए भी बहुत सी जगहों पर मदिरा व्यापार केन्द्र और इसके स्थान को मदिरालय के साथ-साथ कलाली भी कहा जाता है।
कलाली एक बोली भी है जो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में कलाल समाज द्वारा बोली जाने वाली एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध बोली है। यह मुख्य रूप से मराठी, हिंदी और राजस्थानी बोलियों और भाषाओं का एक अनूठा मिश्रण है, जो लोकगीतों और परंपराओं को संजोकर रखती है। कलाली बोली की मुख्य विशेषताएं और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह बोली पारंपरिक लोकगीतों, मुहावरों और लोक कथाओं का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। बोली की भाषा की तरह अपनी कोई लिपि नहीं होती, यह मुख्यतः मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। कलाली बोली का विकास भी मौखिक ही होता रहा है। इसमें मिश्रित शब्दावली है जिसमें मराठी, हिंदी और राजस्थानी के शब्दों का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो इसे एक अलग ही मिठास और पहचान देती है।
इस बोली को संरक्षित करने और इसके लुप्त होने से बचाने के लिए साहित्य के स्तर पर भी प्रयास किए गए हैं। उदाहरण के लिए हमारे अमरावती जिला के निवासी और कलाल जाति के ही प्राचार्य डॉ. रामदास चवरे द्वारा कलाली बोली पर शोध और ‘असो चैतको मयना’ नामक एक कविता संग्रह कलाली बोली का दस्तावेज है। यह कलाली बोली का पहला काव्यसंग्रह है। डॉ. चवरे ने वर्षों की मेहनत से कलाली बोली के मराठी भाषा में अर्थ का एक शब्दकोश भी बनाया है।
महाराष्ट्र के भंडारा, गोंदिया और उससे सटे हुए मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यतः मराठी भाषी कलाल, मराठा कलाल के साथ ही अन्य जाति, समाज के लोग आज भी इस बोली का प्रयोग अपने दैनंदिन व्यवहार में करते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र के विदर्भ में कुछ जगहों पर जहां कलाल बहुतायत में रहते हैं, इस बोली को जानने-समझने वाले लोग हैं।
कलाली बोली सहज और सरल भी है। उदाहरण स्वरुप कलाली में ‘तोरो मरो जमत नई अन् तोरे सिवाय गमत नई!’ का हिंदी में अर्थ ‘तेरा-मेरा जमता नहीं और तेरे बिना गमता नहीं।‘ और मराठी भाषा में अर्थ ‘तुझे माझे जमेना, तुझ्यावाचून करमेना’ होता है।
इसी तरह एक और उदाहरण- ‘जसो आपुन करोन उसो भरोन, यो चुकय नई कैखे सबने सबसे खरो बोलन लगय, दुसरेको मन दुखेन असो बोलनो बरो नाय। असी एक माय आपले टुराके बताय रई ती, टुराबी कान देयके आयकत होतो।’ इसका हिंदी में अर्थ- ‘जैसे अपन (हम) करेंगे वैसा ही भरेंगे। यह चुकता नहीं इसलिए सभी ने सब से खरा (सच) बोलना चाहिए। दूसरे का मन दुखे ऐसा (शब्द) बोलना अच्छा (बरा) नहीं। ऐसा एक माता अपने बच्चे को बता रही थी। बच्चा भी कान देकर (लगाकर) सुन (आयकत) रहा था।‘
आज हमारे देश में बहुत सी भाषा और बोलियां लुप्त हो रही है। तथाकथित सभ्य समाज स्थानीय भाषा और बोलियां बोलने वालों को अशिक्षित और पिछडा़ समझता है इसलिए इनका प्रयोग धीरे-धीरे कम होता जा रहा। लोग आधुनिकता की अंधी दौड़ में ऐसी क्षेत्रीय भाषा बोलियों की मिठास और उसमें रची-बसी अपनी पुरातन, महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक विरासत को खोते जा रहे हैं। ऐसे में जहां भी कलाली बोली का प्रयोग किया जा रहा है, उस क्षेत्र के कलाल समाज के भाषा विज्ञानी, लेखक, कवि, साहित्यकारों के साथ युवाओं को भी कलाली बोली के संरक्षण-संवर्धन के लिए इस पर शोध-कार्य करने होंगे। कलाल जाति के संगठनों का भी यह दायित्व बनता है कि उन्हें इसके लिए प्रेरित करने के प्रयास करें। कलाली बोली कलाल जाति की अपनी बोली है, यह हमारी धरोहर है, हमारे लिए गौरव की बात है।
कलाली बोली बोलने वाले वरिष्ठ नागरिकों से साक्षात्कार करने, और इस बोली की अधिक जानकारी जुटाने के लिए जिन-जिन क्षेत्रों में यह ‘बोली’ बोली जाती है, उन क्षेत्रों में एक शोध-यात्रा शीघ्र ही साहित्यकार पवन नयन जायसवाल और साहित्यकार प्राचार्य डॉ. रामदास चवरे करने वाले हैं।
पवन नयन जायसवाल
साहित्यकार
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष- अखिल भारतीय जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा
सुसंवाद, संदेश- 94217 88630
‘पूर्णिमा’, किशोर नगर, अमरावती
विदर्भ, महाराष्ट्र














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