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दाऊजी मंदिरः अनदेखी भी, मनमानी भी; अवैध ही नहीं, अतिक्रमण भी है यह निर्माण; प्रबंध समिति पर गंभीर सवाल; खतरे में समाज की धरोहर

आगरा।
उम्मीद थी कि दाऊजी मंदिर के बाहरी स्वरूप के साथ मनमानी छेड़छाड़ और अवैध निर्माण का मामला सामने आने के बाद प्रबंध समिति इसका संज्ञान लेगी। लेकिन, समिति आश्चर्यजनक रूप से अवैध निर्माण कराने वालों के पक्ष में खड़ी नजर आ रही है।
अवैध निर्माण कराने वाले दुकानदारों औऱ प्रबंध समिति की पिछले 48 घंटे में जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं औऱ सूत्रों से जो जानकारियां सामने आई हैं, वे बुजुर्गों की इस महान संरचना के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा करने वाली हैं। फिलहाल तो तीन बातें पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी हैं।
नंबर एक, श्री सर्वेश शिवहरे और श्री संजय शिवहरे द्वारा धरोहर को ताक पर रखकर अपनी-अपनी दुकानों पर जो निर्माण कराया गया, वह अवैध तो है ही, अतिक्रमण भी है। यह खुद संजय शिवहरे के पुत्र श्री दीपम शिवहरे ने अपनी प्रतिक्रिया से प्रमाणित किया है। फेसबुक के कमेंट बॉक्स में दीपम लिखते हैं कि करीब 15 वर्ष पूर्व आगरा की तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट रेखा एस चौहान के नेतृत्व में सदरभट्टी चौराहे पर ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चलाया गया था, जिसमें उनकी दुकान का एक हिस्सा गिरा दिया गया था, अब उन्होंने वही हिस्सा बनवाकर दुकान को अपने पुराने स्वरूप में लाने की कोशिश की है। यानी पहले वाला निर्माण अतिक्रमण था, तो जाहिर है यह निर्माण भी अतिक्रमण ही हुआ। आज नहीं तो कल, जब कभी प्रशासन ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चलाएगा, उसमें मंदिर के इस नए निर्माण पर भी बुलडोजर चलना तय है जिससे धरोहर की अपूर्णनीय क्षति हो सकती है। क्योंकि इस बार निर्माण इस कदर अनियमित औऱ मनमाने तरीके से कराया गया है, कि धरोहर को क्षति से बचा पाना मुश्किल होगा।
नंबर दो, इस कृत्य में मंदिर समिति पूरी तरह संलिप्त है। शिवहरेवाणी पर जो समाचार प्रकाशित किया गया, उसके पीछे एकमात्र उद्देश्य धरोहर के साथ गंभीर छेड़छाड़ के इस मामले को मंदिर प्रबंध समिति और समाज के संज्ञान में लाना भर था। उम्मीद थी कि समिति इसकी गंभीरता को समझेगी, और उपयुक्त एक्शन लेगी। मगर समिति की प्रतिक्रिया कल्पना से परे है। जो जानकारियां सामने आई हैं, वे समिति की संलिप्तता को उजागर करती हैं। बताया गया है कि करीब डेढ़-दो महीने पहले बड़ी प्लानिंग के साथ एक शनिवार को रात के सन्नाटे में यह अवैध निर्माण कराया गया, औऱ बचा-खुचा काम रविवार की रात को हुआ। बताया तो यहां तक गया है कि मंदिर के एक बहुत जिम्मेदार पदाधिकारी ने अपनी लेबर को इस काम में लगाया था। अब बहुत संभावना है कि किसी रात के सन्नाटे में इस अवैध निर्माण पर शटर भी जड़ दिया जाएगा। वरना, लोहे के स्ट्रक्चर की जगह पक्का निर्माण कराने के पीछे और क्या वजह हो सकती है? लोहे के पार्टिशन गल रहे थे तो लोहे के नए पार्टिशन लगाने चाहिए थे, लोहे का टिन-शेड गल रहा था तो लोहे या फाइबर का नया शेड लग जाता।
नंबर तीन, यह पूरा प्रकरण मंदिर प्रबंध समिति की मंशा, क्षमता, योग्यता और पात्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा लगता है जैसे मौजूदा समिति को न तो इस धरोहर की महानता का ज्ञान है, ना इसका निर्माण कराने वाले बुजुर्गों की भावना की कद्र है, और ना ही अपने प्राथमिक दायित्वों का अहसास है। मंदिर का सही रखरखाव, उसकी एक-एक ईंट का संरक्षण और अनुरक्षण ही प्रबंध समिति का कर्तव्य होता है जिसकी उसने अक्षम्य अनदेखी की है। क्या ऐसे हाथों में समाज की धरोहर सुरक्षित रहेगी? और हां, यह कोई पहला ऐसा मामला नहीं है, धरोहर के साथ और भी गंभीर छेड़छाड़ इसी समिति के कार्यकाल में हुई हैं, जिनके बारे में आगे चर्चा करेंगे।

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