गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड में एक प्रसंग है। (दोहा क्रमांक 21 के बाद) जिसमें सीता जी की खोज में गए श्री रामदूत हनुमान जी को लंका में बंदी बनाकर रावण के समक्ष लाया गया तब अहंकारी रावण के द्वारा अपनी वीरता के बखान पर हनुमानजी लंकेश का उपहास करते हुए और हैहयवंशी सम्राट कार्तवीर्याजुन का गुणगान कर यह कहतेे है कि मैं तुम्हारी महानता को अच्छी तरह जानता हूँ, जब भगवान योगयोगेश्वर सहस्रार्जुन से लड़ाई में तुम्हारी हार हुई और सहस्रबाहु ने तुम्हे बंदी बनाकर रखा था। हनुमान जी कहते है-
जानऊँ मैं तुम्हारि प्रभुताई,
सहसबाहु सन परी लराई।
श्री राम भक्त हनुमान जी ने यह उल्लेख उस संदर्भ में किया था जब एक दिन पावन सलिला माँ नर्मदा में भगवान श्री सहस्रार्जुन अपनी रानियों संग जलक्रीड़ा कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी सहस्र भुजाओं से नर्मदा की विशाल जलराशि को रोक दिया था। इससे सारा जल विरुद्ध दिशा और तट की ओर प्रवाहित होने लगा। विश्व विजय की कामना से निकला रावण उस समय नर्मदा तट पर भगवान शिव का पूजन कर रहा था। भगवान श्री सहस्रार्जुन को इस बात का पता नहीं था लेकिन उनकी जलक्रीड़ा से रावण की पूजा सामग्री पानी में बह कर नष्ट हो गई। इसके कारण रावण क्रोधित हो गया और भगवान श्री सहस्रार्जुन को ललकारता हुआ उनसे युद्ध करने लगा। इस युद्ध में माहिष्मती के सम्राट भगवान श्री सहस्रार्जुन ने लंकेश दशानन रावण को पराजित कर अपने कारागृह में बंदी बनाकर रखा था, तब रावण के पितामह पुलस्त्य ऋषि ने भगवान श्री सहस्रार्जुन की राजधानी में पधारकर रावण को कैद से मुक्त करने का निवेदन किया था। ऋषि का सम्मान करते हुए भगवान श्री सहस्रार्जुन ने रावण को अपनी कैद से मुक्त किया था।
श्री रामचरितमानस मानस में रामदूत अंगद और रावण संवाद में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्री सहस्रार्जुन द्वारा रावण को कैद में रखने का उल्लेख करते हुए लिखा है-
एक बहोरि सहसभुज देखा।
धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥
कौतुक लागि भवन लै आवा।
सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा॥
इसका भावार्थ यह है कि एक रावण को सहस्रबाहु ने देखा, और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकार के विचित्र जन्तु की तरह समझकर पकड़ लिया। तमाशे के लिए वह उसे घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया।
रावण के बलशाली होने का एक उल्लेख रामचरितमानस के बालकाण्ड के दोहा क्रमांक 179 में भी है जब रावण द्वारा कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं पर उठाने का वर्णन है, जो उसकी अपार शक्ति और अहंकार को दर्शाता है, क्योंकि उसने यह सब खिलवाड़ में किया।
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥
लंकापति दशानन रावण कितना बलशाली था इसका एक और वर्णन भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के लंका काण्ड की एक चौपाई में रावण की पत्नी मंदोदरी के मुख से किया है जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम द्वारा युद्ध में रावण का वध किया जाता है तब इन शब्दों के साथ प्रारंभ होनेवाली यह चौपाई-
तव बल नाथ डोल नित धरनी।
तेज हीन पावक शशि तरनी।
जिसमें रावण के मृत शरीर के पास विलाप करती हुई मंदोदरी कहती हैं- ‘आप तो महा प्रतापी थे। आपके बल से तो यह धरा भी डर के मारे काँपती थी। समस्त संसार को अपने तेज से प्रभावित करने वाले सूर्य, चंद्रमा और अग्नि सब आपके सामने फीके पड़ जाते थे। शेष और कच्छप जिसके भार को सहन करने में असमर्थ थे। आपके सामने तो जल के देवता वरुण, धन के देवता कुबेर, इंद्र, वायु आदि कभी टिक नहीं पाए। आपके सम्मुख धैर्य नहीं रख पाए। अपनी भुजाओं के बल से आपने काल को भी जीत लिया था। यमराज भी आपके अधीन थे। सारा संसार तुम्हारी वीरता के बारे में जानता है।‘
रामचरितमानस में उल्लेखित यह सभी प्रसंग हैहयवंश के कुलदीपक भगवान श्री अर्जुन कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के ऋषि-मुनि का आदर-सम्मान, सच्चरित्र, कीर्ति और एक महावीर की वीरता का परिचायक है जिन्होंने रावण जैसे वीर को भी युद्ध में पराजित कर अपनी राजधानी के बंदीगृह में रखा था।
-पवन नयन जायसवाल
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष- अखिल भारतीय जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा
संयोजक- भगवान श्री सहस्रार्जुन जन्मोत्सव जागरूकता अभियान
सुसंवाद, संदेश- 94217 88630
अमरावती, विदर्भ, महाराष्ट्र
समाचार
हनुमानजी और अंगद ने सहस्रबाहु का नाम लेकर कुरेदा था रावण के ‘जख्म’; महाकवि तुलसी की रामचरितमानस में सहस्रबाहु की महिमा का वर्णन
- by admin
- December 28, 2025
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- 3 months ago












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