by Som Sahu June 12, 2017 घटनाक्रम 1278
- शिवहरे समाज एकता परिषद के 2 जुलाई के मेधावी छात्र-छात्रा समारोह में होना था सम्मान
- एक महीना बीमार रहने के बाद काजल शिवहरे का अहमदाबाद के अस्पताल में हो गया निधन
शिवहरे वाणी नेटवर्क
आगरा।
किसी भी परीक्षा में बच्चा शानदार सफलता हासिल करे तो माता-पिता खुशी से रो पड़ते हैं। लेकिन बालूगंज निवासी जितेंद्र शिवहरे और श्रीमती ममता शिवहरे के साथ किस्मत ने ऐसा खेल खेला कि हर देखने-सुनने वाले की आंखे छलक जाती हैं। बेटी काजल शिवहरे का रिजल्ट आया तो उसकी कामयाबी का जश्न इसलिए नही मना पाए कि उसकी तबीयत खराब थी। सोचा था कि तबीयत ठीक होने पर काजल की मनचाही इच्छा पूरी करेंगे, जैसा कि उससे वादा किया था। लेकिन बदकिस्मती… काजल की छोटी सी जिंदगी ने यह मौका दिया ही नहीं। काजल ने अपनी बीमारी से लड़ते हुए बीती सात जून को अहमदाबाद के अस्पताल में दम तोड़ दिया। शिवहरे समाज एकता परिषद की ओऱ से 2 जुलाई को होने वाले मेधावी छात्र-छात्रा सम्मान समारोह में उसका भी सम्मान किया जाना था। हालांकि परिषद अब इस सम्मान को लेने के लिए काजल के माता-पिता को आमंत्रित करेगी।
सेंट एंथनीज की छात्रा काजल शिवहरे पढ़ाई में शुरू से अच्छी थी। एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टीविटीज में भी आगे थी, जिसके चलते वह अपने टीचर्स के लिए प्यारी स्टूडेंट थी। आईसीएसई की दसवीं की परीक्षा देने के कुछ समय बाद अचानक उसे सिरदर्द और बुखार की शिकायत हुई। सात मई को उसे एसएन मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। डाक्टर्स को समझ नहीं आ रहा था कि बीमारी क्या है। वह ठीक हो जाती और दो दिन बाद फिर बुखार और सिरदर्द पकड़ लेता था।
एक बीयर की दुकान में काम करने वाले जितेंद्र शिवहरे हर हाल मे बेटी को बचाना चाहते थे। अपनी सारी जमा पूंजी बच्ची के इलाज में लगा दी। यहां तक कि काजल की देखभाल करने के लिए उन्होंने नौकरी तक छोड़ दी।
आगरा में कई डाक्टरों को दिखाया, लेकिन बीमारी का पता नहीं चल पा रहा था। काजोल बीमारी से कमजोर पड़ती जा रही थी, टूटती जा रही थी। तब, किसी की सलाह पर जितेंद्र शिवहरे ने अपनी बेटी को अहमदाबाद के एक अस्पताल में भर्ती करा दिया। अस्पताल में उसका उपचार चला। विशेष जांच की गई जिसके लिए रीढ़ की हड्डी से फ्ल्यूड लिया गया। जांच रिपोर्ट में दिमाग में टीबी की बीमारी कन्फर्म हुई। इसका उपचार हो सकता है, डाक्टरों के इस आश्वासन ने जितेंद्र शिवहरे को राहत दी। काजोल को दवा दी जिसका असर दिखने लगा, काजल ठीक होने लगी। उम्मीद की मुरझाई बेल मानों फिर हरी-भरी होने लगी। डाक्टरों ने अस्पताल से उसकी छुट्टी की तैयारी कर दी। लेकिन पांच जून को जिस दिन अस्पताल से काजोल की छुट्टी होनी थी, उसी दिन एक नई कांप्लिकेशन पैदा हो गई। उसके फेफड़ों में पानी चला गया, जिससे फेफडों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही थी। काजोल कोमा में चली गई, और छह जून को हमेशा के लिए दूर.बहुत दूर चली गई।
काजोल की हंसती खेलती स्मृतियां… घर में उसका स्कूल बैग, किताबें, ड्रेस और मार्कशीट… अब परिजनों को ही नहीं, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, क्लासमेट्स और टीचर्स सबको रुला रही हैं।












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