हैहय क्षत्रिय वंश के कुलदीपक और हम कलाल, कलार, कलवार, कलचुरियों के आराध्य भगवान सहस्रार्जुन के कई चित्र और प्रतिमा आज बहुत सी जगह पर है लेकिन उनमें सही चित्र और प्रतिमा कौन सी है, यह प्रश्न हमेशा बना रहता है।
आजकल कम्प्यूटर और मोबाइल फोन में अनगिनत ऐसे एप उपलब्ध है जिससे कई लोग श्रद्धा, भक्ति में या चित्र को सुंदर बनाने के लिए जाने-अनजाने या अपने ज्ञान को प्रदर्शित करने ऐसे चित्र या प्रतिमा बना या बनवा लेते है जो शास्त्रीय आधार पर सही नहीं होते। भगवान श्री सहस्रार्जुन के गलत बने कई चित्र आजकल समाज के वाट्सएप और फेसबुक समुहों पर बिना सोचे-समझे साझा और प्रचारित-प्रसारित किए जा रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि क्षणभर में ऐप से बने ऐसे चित्र पर भी कुछ लोग हमारा बनाया हुआ चित्र होने का दावा भी ठोकते हैं। ऐसे विद्रूप चित्र का बनाया जाना और प्रचार-प्रसार करना बहुत चिंतनीय है।
धर्म शास्त्रों के आधार पर माना जाता है कि भगवान कार्तवीर्यार्जुन/सहस्रार्जुन/सहस्रबाहु की वह प्रतिमा या चित्र ही सही है जिसमे कम-से-कम उनके सोलह या इससे ज्यादा हाथ (भुजा) हों क्योंकि वह सहस्र भुजा धारी हैं और उनके दाहिने कंधे पर तूणीर (वह पात्र जिसमें तीर या बाण रखते है), तरकश, भाता विराजित या सुशोभित हो और बाएं हाथ में कमान हो लेकिन इससे कम भुजा और बाएं कंधे पर तूणीर और दाहिने हाथ में कमान या शरीर के एक ही भाग में तीर-कमान दोनों ही दर्शाने वाली प्रतिमा और चित्र भी दिखाई पड़ते है।
यहां इस बात का ध्यान रखा जाए कि भगवान की सहस्रबाहु वाली प्रतिमा के हाथ अस्त्र-शस्त्रधारी और चेहरे पर वीरोचित भाव दर्शाने वाले हो। चेहरे पर मुछें भी बहुत ज्यादा बड़ी न हों और चेहरे पर आकर्षण और मोहकता हो क्योंकि भगवान श्री सहस्रार्जुन की प्रतिमा में दो शरीर दर्शाएं जाते हैं। पहली मुख्य अर्जुन कार्तवीर्य की प्रतिमा और पीछे भगवान श्री सहस्रार्जुन की युद्ध के समय सहस्र हाथों वाली विशिष्ट आभासी प्रतिमा। इसी सहस्र-भुजाओं वाली प्रतिमा से ही पहली दृष्टि में ही भगवान श्री सहस्रार्जुन की पहचान दूसरे देवी-देवताओं की प्रतिमा से अलग करा देती है।
यह भी होता है कि कई लोग खुद को प्रचारित करने के लिए भगवान के चित्र के साथ अपना चित्र जोड़कर नाम भी लिखते है। कभी-कभी तो अपना चित्र भगवान के चित्र से उपर लगा देते है और भगवान के चित्र पर अपना नाम लिखते है। यह बहुत ही गलत है। इससे भगवान के चित्र दूषित हो जाते है। भगवान के चित्र पर उनके नाम के अलावा कुछ भी नहीं लिखना चाहिए और अगर अपनी फोटो लगाने की प्रबल ईच्छा या मनोकामना को रोक नहीं सको तो अपने फोटो को भगवान के चरणों से निचले भाग की ओर रखना चाहिए। ध्यान रहे आपका चित्र भगवान के चित्र के समकक्ष या उनकी प्रतिमा से बड़ा न रहे। भगवान का स्थान हमेशा ऊँचा रहना चाहिए।
मंदिर में भी हमें मूर्ति नहीं भगवान श्री सहस्रार्जुन की प्रतिमा स्थापित करवानी चाहिए और प्रतिमा बनवाते समय कलाकार को शास्त्रीय आधार पर उसे जानकारी देनी चाहिए जिससे वह विशुद्ध प्रतिमा बनें। वैसे देखा जाए तो मूर्ति और प्रतिमा दोनों ही एक-दूसरे के पर्यायवाची लगते हैं लेकिन मूर्ति और प्रतिमा में बहुत अंतर होता है। प्रतिमा उस देवता का प्रतीक होती है, उसमें शास्त्र सम्मत उनके अस्त्र-शस्त्र, वाहन और उस देवता से संबंधित अन्य विशेषताओं को शास्त्रीय आधार पर दर्शाया जाता है। खुदाई में प्राप्त प्रतिमाओं की पहचान भी पुरातत्व विभाग द्वारा इसी आधार पर की जाती है। बहुत बार मूर्तियां उत्सव या कुछ समय के लिए बनाकर विसर्जन किया जाता है उसमें थोड़ी भिन्नता भी होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण गणेशोत्सव में दिखाई देता है।
इसके साथ-साथ हमें अपने आराध्य का नाम भी सही लिखना चाहिए जैसा इस संदेश में लिखा गया है। भगवान श्री सहस्रार्जुन के पूर्णाकृति प्रतिमा और चित्र की ही पूजा-अर्चना करनी चाहिए। आधे-अधूरे, कटे-फटे चित्र पूजन के योग्य नहीं होते।
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी, ‘सहस्रार्जुन सप्तमी’ को हैहयवंश के कुलदीपक और हमारे आराध्य भगवान श्री सहस्रार्जुन जयंती दिवस पर कलाल, कलार, कलवार, कलचुरियों के हर घर में भगवान श्री सहस्रार्जुन का चित्र लगे और परिवार का प्रत्येक व्यक्ति भगवान सहस्रार्जुन का पूजन करे, भगवान श्री सहस्रार्जुन के जन्म का उत्सव मनाएं यही कामना।
(ऊपर दिए चित्र शास्त्रीय आधार पर प्रमाणित है।)
-पवन नयन जायसवाल
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष- अखिल भारतीय जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा
संयोजक- भगवान श्री सहस्रार्जुन जन्मोत्सव जागरूकता अभियान
वरिष्ठ साहित्यकार
सुसंवाद, संदेश- 94217 88630
अमरावती, विदर्भ, महाराष्ट्र
समाचार
भगवान सहस्रबाहु के प्रमाणित चित्र और प्रतिमा; विद्रूप चित्र का बनाया जाना बहुत चिंताजनक
- by admin
- October 31, 2026
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- 1 hour ago













