भाई अरविंद गुप्ता ने राधाकृष्ण मंदिर के अध्यक्ष पद छोड़ने के अपने इरादे को शिवहरेवाणी न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित एक आलेख के माध्यम से उदघाटित किया। भाई अरविंद गुप्ता ने जिस जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्व का निर्वहन किया, जिस समर्पण भाव से इस धरोहर की सेवा की, वह प्रशंसनीय है, जिसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूं।
राधाकृष्ण मंदिर आगरा में शिवहरे समाज की ऐसी धरोहर है जो रातों-रात अस्तित्व में आई थी। लेकिन इस धरोहर के वर्तमान स्वरूप में आने की कहानी काफी संघर्षपूर्ण है। मेरे लिए सौभाग्य और गर्व की बात है कि इस संघर्ष में मैं भी शामिल रहा। वर्ष 2000 में मैं अपने परिवार और कारोबार के साथ फिरोजाबाद से आगरा शिफ्ट हुआ, मंदिर से लगे आलमगंज फाटक के अंदर अपने पुश्तैनी घर में। राधाकृष्ण मंदिर हर आगरावासी शिवहरेबंधु के लिए एक गौरवशाली धरोहर है, खासतौर से हम लोहामंडी के शिवहरे समाजबंधुओं के तो हृदय से लगी है। मेरी भी सुबह राधाकृष्ण मंदिर मे पूजा-अर्चना के साथ ही शुरू होती थी। उस वक्त मंदिर का स्वरूप याद आता है… टिनशेड में एक प्लेटफार्म था जिस पर राधाकृष्ण की प्रतिमा थी जिसकी पूजा होती थी। दुकानों के ऊपर एक हॉल था जहां समाज के मांगलिक कार्यक्रम होते थे। पिछली दीवार के पीछे एक बाड़ा जो मंदिर की ही संपत्ति थी जिसमें 8-9 शिवहरे परिवार वर्षों से किरायेदार थे। कुल मिलाकर प्रापर्टी ब़ड़ी थी, लेकिन मंदिर बहुत छोटा और अव्यवस्थित। यह देख मन में अक्सर विचार उठता कि समाज की इस धरोहर को उसका वो वैभव दिलाना होगा, जिसका सपना पूर्वजों ने देखा था।
गजब देखिए, राधाकृष्णजी की ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने जल्द ही मुझे अपनी सेवा में ले लिया। मंदिर के लंबे समय से अध्यक्ष चले आ रहे स्व. श्री रामनाथजी गुप्ता (लोहेवाले) ने वर्ष 2003 में अपनी जिम्मेदारी मुझे सौंप दी। मैंने 11 सदस्यीय कार्यकारिणी बनाई जिसके सभी सदस्य लगभग मेरे जैसी उम्र औऱ मेरे जैसी सोच के थे..युवा और जोशीले। इनमें ज्यादातर लोहामंडी के ही रहने वाले थे। हमने लक्ष्य तय किया धरोहर को उसका वैभव दिलाना है। और, इसका पहला कदम था-मंदिर की प्रॉपर्टी को किरायेदारों से मुक्त कराना। काम मुश्किल था। बड़े हाथ-पैर मारे, बड़े मान-मनोव्वल किए, तब कहीं जाकर कुछ बात बनी। सबसे पहले लवलेश गुप्ता (काकेभाई) ने खाली किया, कुछ किरायेदारों को हॉल में शिफ्ट कराया, एक किरायेदार को मैंने अपने घर में रखा, कई साल…बिल्कुल फ्री, बिजली-पानी का बिल भी मैं ही देता था। एक को मंदिर के बाहर किराये पर शिफ्ट किया, किराया मैं देता था 2200 रुपये महीना, करीब सात साल दिए। इस तरह बाड़े को खाली कराया जा सका, जिसमें डेढ़-दो साल लग गए। फिर टिनशेड समेत पूरी जमीन को समतल कराया, नया नक्शा तैयार कराया। औऱ इस तरह वर्ष 2007 में मंदिर के पुनर्निर्माण का भूमिपूजन कराया, जहां समाज की बड़ी उपस्थित रही, धनी-मानी समाजबंधुओं ने दान की घोषणाएं कीं जिससे हमारा जोश सातवें आसमान पर पहुंच गया। जल्द ही काम शुरू करा दिया। पूरी कार्यकारिणी ने बहुत मेहनत की, दिन में मजदूरों से काम कराते, रात-रातभर जागकर ईंट, बजरी, सरिया के ट्रक उतरवाते। रोज चंदा लेने भी निकलते। जैसे-जैसे पैसा आता, काम आगे बढ़ता जाता।
वक्त के साथ चंदा मिलना कम होता गया, तो टीम का जोश भी ठंडा पड़ने लगा। स्थिति ऐसी हो गई कि चंदा लेने के लिए दो-तीन साथी ही जुट पाते थे, समाज से भी चंदा नहीं मिल पा रहा था। हम पर हताशा हावी होने लगी, लेकिन तब मेरी स्वर्गवासी माताजी श्रीमती राजकुमारी गुप्ता मुझे ताकत देतीं। तमाम उपेक्षाओं के बावजूद उन्होंने मुझे हताश नहीं होने दिया, औऱ सुबह ही मुझे घर से निकाल देती थीं, कहतीं-तुम्हें तो अपना कर्म करना है, भगवान का काम तो भगवान करा ही लेंगे। और ऐसा हुआ भी…। मुश्किल के उस दौर में स्व. श्री चंद्रशेखर शिवहरे ‘चंदू कप्तान’ मेरे जीवन में संजीवनी बनकर आ गए, शायद भगवान ने ही उन्हें हमारा साथ देने का कोई चक्र रचा होगा। चंदू कप्तान म़ॉर्निंग वॉक पर सुभाष पार्क जाते थे, और हम उन्हें वहीं से अपने साथ ले लेते थे। फिर हम लोग प्रतिष्ठित समाजबंधुओं के घर जाते जहां चंदू कप्तान अपने चिर-परिचित अंदाज में इस तरह बात-इसरार करते कि सामने वाला हमें टाल नहीं पाता था। यह रोज का काम था, जो महीनों तक चला। चंदू कप्तान ने हमारा बहुत साथ दिया, खूब चंदा दिलवाया। मंदिर के काम को आगे बढ़ाने में उनका यह योगदान मैं कभी भुला नहीं सकता। आज यह लेख लिखते समय में अपनी स्वर्गवासी माताजी और स्व. चंदू कप्तान की प्रेरक स्मृतियों को नमन करता हूं।
खैर, इस तरह हमें समाज से 51 लाख रुपये से अधिक का चंदा मिला था। आय-व्यय के कागज मेरे पास आज भी मौजूद हैं। जिनके चित्र मैं नीचे प्रस्तुत कर रहा हूः-




आने वाले समय में दानदाताओं का यह विवरण पत्थर पर अंकित कर मंदिर में कहीं लगवाया जाए, नए नेतृत्व से मेरी यह अपेक्षा है।
इस तरह चार-पांच साल में मंदिर का इतना काम हो गया कि राधाकृष्ण भगवान की प्रतिमा स्थापित की जा सके। प्रतिमा के लिए हमने घर-घर जाकर झोली फैलाई, लोगों ने अपनी-अपनी श्रद्धा और क्षमता से दान किया, 10-10 रुपये का योगदान भी स्वीकार किया। और वर्ष 2013 में धूमधाम से मंदिर में प्रतिमा की स्थापना करवाई गई। लेकिन, इन सालों मैं मंदिर के काम में इत कदर उलझा रहा कि जीवन के बाकी काम पीछे रह गए। कारोबार प्रभावित हो रहा था, परिवार भी पीड़ित था। परिवार के साथ त्योहार तक नहीं मना पाता। दिवाली बीतती गोवर्धन पूजा के लिए चंदा जुटाने में, और होली निकल जाती होली-मिलन के लिए चंदा लेने में। इधर एडीए ने मंदिर का नक्शा पास न होने को लेकर मेरे खिलाफ वारंट जारी कर दिए, और अफसोस ये कि कोई मेरी जमानत लेने को राजी नहीं था। तब राजेंद्र गुप्ता मास्टरसाहब और स्व. श्री रमेशचंद्र गुप्ता आगे आए और मेरी जमानत ली। मैं दो बार अदालत के कटघरे में खड़ा हुआ, जमानत ली। यह केस अभी तक चल रहा है, हमारी कार्यकारिणी में सचिव रहे वीरेंद्र गुप्ता एडवोकेट मेरी पैरवी कर रहे हैं। इन स्थितियों में मैंने अपने जीवन को ढर्रे पर लाने के लिए मंदिर की जिम्मेदारी से कुछ विश्राम लेने का निर्णय किया। 11 साल मंदिर की सेवा करने के बाद 2014 में मैंने अध्यक्ष पद छोड़ दिया, जिसके बाद स्व. श्री दयाशंकर शिवहरे ने यह जिम्मेदारी संभाली। और उनके बाद 2017 में भाई अरविंद गुप्ता ने मंदिर की कमान हाथ में ली और पुनर्निर्माण के दूसरे चरण को आगे बढ़ाया।
मैं अपनी कार्यकारिणी के सदस्यों को हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने मेरे साथ मंदिर में योगदान किया (इनमें कई स्वर्गवासी हो चुके हैं)। मेरे बाद के अध्यक्षों स्व. श्री दयाशंकर शिवहरे औऱ श्री अरविंद गुप्ता व उनकी टीम का भी आभार मानता हूं कि उन्होंने मंदिर के वैभव की अभिवृद्धि में अप्रतिम योगदान किया। अब नए नेतृत्व की बारी है। जो भी नेतृत्व आएगा, उसके पास काम कराने के लिए सबसे उपयुक्त स्थितियां हैं। जैसे वर्तमान में एमएलसी श्री विजय शिवहरे के रूप में एक सशक्त राजनीतिक शख्सियत हमारे पास है जो समाज के लिए हरदम तत्पर रहते हैं। नए नेतृत्व को उनका साथ लेकर आगे बढ़ना चाहिए। दूसरे आज शिवहरेवाणी जैसा मंच भी समाज के पास है जो हमारे दौर में नहीं था। हम इस माध्यम से अपनी बात को मिनटों में आगरा ही नहीं, देशभर के समाज में पहुंचा सकते हैं।
एक अच्छा संकेत यह है कि मंदिर के नेतृत्व के लिए ऊर्जावान प्रतिभाशाली युवाओं की एक सशक्त और बड़ी टीम तैयार हो रही है, जिनमें ज्यादातर लोहामंडी के युवा हैं। इस टीम ने बीते दिनों मुझसे संपर्क किया, और मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। मैं भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से कुछ हल्का हुआ हूं तो एक संरक्षक के रूप में बुजुर्गाना भूमिका में ही सही, सामाजिक जीवन की दूसरी पारी के लिए तैयार हूं। मेरी शुभकामनाएं इन युवाओं के साथ हैं, और रहेंगी। मुझे यकीन है कि नए साल में मंदिर का नया नेतृत्व बुजुर्गों की इस धरोहर को और अधिक वैभवशाली, समाज के लिए और अधिक उपयोगी स्वरूप में लाएगी, इसी कामना के साथ सभी समाजबंधुओं को नए साल की शुभकामनाएं।
-विनय गुप्ता
पूर्व अध्यक्ष, राधाकृष्ण मंदिर, लोहामंडी आगरा।
लॉयर्स कालोनी, खंदारी, आगरा।
संपर्कः-9927003858









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