आगरा।
भगवान श्रीकृष्ण हमारी संस्कृति के एक अद्भुत और विलक्षण महानायक हैं। वह राजनीति और जीवन दर्शन के प्रकांड पंडित हैं, ज्ञान-कर्म-भक्ति का समन्वयवादी धर्म उन्होंने प्रवर्तित किया। वह सभी रचनात्मक एवं सृजनात्मक प्रवृत्तियों के स्वामी हैं। आगरा के शिवहरे समाजबंधु अपनी दोनों धरोहरों ‘मंदिर श्री दाऊजी महाराज’ और ‘मंदिर श्री राधाकृष्ण’ में हर वर्ष जन्माष्टमी पर अदभुत सजावट कर भगवान कृष्ण के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त करते हैं। हालांकि अब समय के साथ काफी-कुछ बदल चुका है।
एक दौर था जब राधाकृष्ण मंदिर (आलमगंज, लोहामंडी) जन्माष्टमी पर अपनी अदभुत झांकियों के चलते आगरा शहर ही नहीं, आसपास के गांव-कस्बों तक में चर्चित रहता था। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ीं झांकियों के अतिरिक्त उस समय के ज्वलंत मुद्दों पर आधारित और सामाजिक संदेश देने वाली झांकियां भी तैयार की जाती थीं। इन झांकियों को बनाने में उस दौर के नवीनतम ट्रेंड्स और टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता था। जानकर आश्चर्य हो सकता है कि आगरा में जन्माष्टमी पर पहली इलेक्ट्रॉनिक झांकी का प्रदर्शन भी राधाकृष्ण मंदिर में किया गया था जिसकी कमान नाई की मंडी निवासी स्व. श्री आनंद गुप्ता (सह-संस्थापक शिवहरेवाणी) ने संभाली थी।

जरा सोचिये, उस दौर में जब तकनीक आज की तरह आम नहीं थी, तब श्री आनंद गुप्ता अपनी रचनात्मकता और वैज्ञानिक सोच के साथ बिजली और मोटर के इस्तेमाल से चलती-फिरती इलेक्ट्रॉनिक झांकियां तैयार करते थे। इन झांकियों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, कारागार के कपाट स्वतः खुलना, वासुदेव जी का यमुना पार करना और कालिया नाग मर्दन जैसे प्रसंगों को दिखाया जाता था। 10-15 मिनट की इस झांकी को तैयार करने के लिए श्री आनंद गुप्ता को तीन-चार दिन पहले से दिन-रात जुटना पड़ता था। समाज के युवा वालेंटियर्स उनकी सहायता में रहते थे। इन झांकियों को लेकर इस कदर क्रेज था कि जन्माष्टमी के बाद भी तीन-तीन दिन तक दर्शनार्थियों की भीड़ यहां उमड़ती रहती थी। अस्सी के दशक के अंत तक (लगभग 1990 तक) हर साल जन्माष्टमी पर राधाकृष्ण मंदिर में यही नजारे रहते थे। अखबारों में प्रमुखता से इसकी कवरेज छपती थी। संभवतः राधाकृष्ण मंदिर के इसी झांकी से प्रेरित होकर सेंट जोंस कालेज के प्रोफेसर डा. माहेश्वरी ने भी जन्माष्टमी पर माथुर वैश्य छात्रावास में ऐसी ही झांकी की शुरुआत की थी जो काफी प्रसिद्ध हुई थी।

वहीं शिवहरे समाज की प्रमुख धरोहर सदर भट्टी चौराहा स्थित मंदिर श्री दाऊजी महाराज भी जन्माष्टमी पर लोगों को आकर्षित करता था। आजादी के ठीक बाद शिवहरे मित्र मंडल के बैनर तले युवाओं ने शिवहरे समाज में बाकायदा एक सुधारवादी आंदोलन चलाया था, और दाऊजी मंदिर इनकी गतिविधियों का केंद्र था। शिवहरे मित्र मंडल के युवा वॉलेंटियर्स हर साल जन्माष्टमी पर दाऊजी मंदिर में ऐसी झांकियों का प्रदर्शन करते थे, जो सामाजिक मुद्दों पर उनकी आधुनिक सोच को प्रदर्शित करती थी। ये झांकियों ज्यादातर समाज में शिक्षा के विस्तार, कुरीतियो के दमन, सात्विकता को अपनाने और विज्ञान के चमत्कारों पर केंद्रित रहती थीं।

समय के साथ दोनों ही धरोहरों में जन्माष्टमी पर सजावट के स्वरूप व तौर-तरीकों में बदलाव आना तो स्वाभाविक है। 90 के दशक से सामाजिक चेतना व संदेशों वाली झांकियों की जगह धार्मिक झांकियों की प्रधानता होने लगी। बच्चों को भगवान का स्वरूप बनाकर बिठाया जाने लगा। बर्फ से गुफाएं बनाई जाने लगी, रूई से पहाड़ बनाए जाते, लकड़ी के बुरादे और पेड़ों की हरी-भरी टहनियों का इस्तेमाल सजावट में प्रधानता से किया जाने लगा। इस दौर में दाऊजी मंदिर में सजावट की कमान मुख्यतः नाई की मंडी के युवाओं के हाथ में रहती थी, तो राधाकृष्ण मंदिर को सजाने का जिम्मा ज्यादातर लोहामंडी के युवाओं के पास होता था।

लेकिन, अब वो भी नही रहा। अब जन्माष्टमी पर समाज के युवाओं की वैसी भागीदारी नहीं दिखती। गत लगभग दस वर्षों से दोनों ही मंदिरों में जन्माष्टमी की सजावट का जिम्मा उनकी कमेटियों के पास रहने लगा है। दोनों ही धरोहरों में अब झांकियां नहीं सजतीं, बल्कि स्वरूपों के आकर्षक श्रृंगार-पोशाक, फूलबंगले, फूलों से सजावट, आर्टिफिशियल हरियाली और फव्वारे आदि के उपयोग का चलन बढ़ा है, इन पर भारी-भरकम खर्चा होता है। यह सजावट और चकाचौंध आकर्षक तो खूब लगती हैं लेकिन इसमें शिवहरे समाज की वैसी रचनात्मकता, सृजनात्मकता और कलात्मक अभिरुचियों के दर्शन नहीं होते, जो आज से 15 साल पहले तक जन्माष्टमी पर सजीं झांकियों में नजर आती थीं, जिनकी यादें आज भी प्रेरित करती हैं।













