आगरा।
हर बच्चा अपने आपमें खास होता है, और हर बच्चे में कुछ न कुछ खास होता है। जरूरत उसे पहचानने और निखारकर सामने लाने वाले की होती है। और, लोहामंडी में शिवहरे गली निवासी सुश्री दीपा गुप्ता इस हुनर में माहिर है। तभी तो यहां हर साल सजने वाले दुर्गा पंडाल में वह लोगों को चौंकाती रहती हैं।
पिछली बार रामलीला में घर की बुजुर्ग महिलाओं, युवक-युवतियों और बच्चों से अभिनय कराया था, तो इस बार छोटे-छोटे बच्चों से गणेश-लीला कराकर सभी को हैरान कर दिया। सोनी टीवी के सीरियल ‘विघ्नहर्ता गणेश’ पर आधारित यह ‘गणेशलीला’ दरअसल भगवान गणेश के जीवन से जुड़ी दो कथाओं के दो पार्ट में तैयार की गई थी। पहले पार्ट में भगवान गणेश और रिद्धी-सिद्धी के विवाह की कथा का मंचन था, जबकि दूसरा पार्ट भगवान गणेश को कुबेर देवता की दावत की प्रचलित कहानी पर आधारित था। इसे छाया नाट्य (Shadow Play) शैली में तैयार किया गया था जिसमें संवाद नेपथ्य से आते हैं और कलाकारों को सिर्फ उन पर अपनी भाव-भंगिमाओं से अभिव्यक्ति देनी होती है। नाटक के संवाद टीवी सीरियल विघ्नहर्ता गणेश से संकलित किए गए थे जिन्हें सुश्री दीपा गुप्ता के निर्देशन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर यश गुप्ता ने कुशलता से संपादित किया।

रात करीब साढ़े आठ बजे माता की आरती और भोग-प्रसादी के बाद गणेशलीला का मंचन शुरू हुआ। इसमें सबसे ज्यादा हैरान किया मास्टर रुद्र (पुत्र श्री तुषार गुप्ता ‘तनु’) ने, जिसने पहले पार्ट में मूषक औऱ दूसरे पार्ट में गढ़ की भूमिका निभाई। दर्शकों के लिए यह कल्पना से परे था कि बाजू से नाक पोछने वाला चार साल का यह बच्चा मंच पर इसने आत्मविश्वास से अपना काम करेगा। पहले पार्ट में विश्वकर्मा और दूसरे पार्ट में कुबेर की भूमिका निभाने वाले मिलान गुप्ता (पुत्र श्री चंदन गुप्ता) ने भी अपनी दोनों भूमिकाओं में खूब सराहना बटोरी लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित किया गणेश बने अथर्व गुप्ता (पुत्र श्री अमित गुप्ता ‘गोल्डी’) ने। सेंट पीटर्स में कक्षा छह के छात्र अथर्व गुप्ता ने किसी मझे कलाकार की तरह संवाद अदायगी के अनुरूप भाव-भंगिमाओं से ऐसा अभिनय किया कि एक बारगी को विघ्नहर्ता गणेश के बाल-गणेश भी पीछे नजर आए।

नाटक में आदित्य (पुत्र श्री राजकुमार गुप्ता) ने भगवान शिव, एंजल (पुत्री श्री अमित गुप्ता पानी वाले) ने पार्वती, रशिका (पुत्री श्री तुषार गुप्ता ‘तनु’) ने रिद्धी एवं भद्रा, पीहू (पुत्री श्री हनीश गुप्ता खिलौने वाले) ने सिद्धी, गौरी (पुत्री श्री मोहन गुप्ता) ने तुलसी मां, अंशुमन (पुत्र श्री अतुल गुप्ता) ने गढ़ की भूमिका को बड़े प्रभावी अंदाज में प्रस्तुत किया।

सुश्री दीपा गुप्ता इन बच्चों के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा थीं, जिन्होंने पिछले करीब डेढ़ महीने की प्लानिंग और पंद्रह दिन की कड़ी मेहनत से यह प्रस्तुति तैयार कराई। बच्चों से अभिनय कराना सबसे मुश्किल होता है लेकिन दीपा ने बड़े प्यार से इन बच्चों को स्टेज के भय से मुक्त कर आत्मविश्वास से लबरेज किया। निश्चय ही अब ये बच्चे में भविष्य अपने-अपने स्कूल में होने वाली भाषण प्रतियोगिताओं या मंचीय प्रस्तुतियों में पीछे रहने वाले नहीं है। इसकी छाप उनके व्यक्तित्व में भी नजर आएगी।

दीपा गुप्ता मानती हैं कि दुर्गा पंडाल सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि संगीत, लोककला और संस्कृति का संगम है। उन्होंने कहा कि वह आगे भी हर साल दुर्गा पंडाल के लिए इस तरह की कोई न कोई प्रस्तुति तैयार करती रहेंगी। अगले वर्ष के लिए उन्होंने कृष्ण लीला तैयार करने की सोच रखी है। कलाओं के प्रति अनुराग व अभिरुचि रखने वाले समाज को ही सही मायने में प्रगतिशील कहा जा सकता है, जो कि लोहामंडी के शिवहरे समाज ने साबित भी कर दिया।
















