—भगवान श्री एकवीर हैहय के जन्म दिवस पर विशेष—
रविवार, दिनांक 11 अक्टूबर 2026, कलचुरि संवत् 1778, शरद ऋतु, आश्विन(क्वांर) मास, प्रतिपदा तिथि, नवरात्रों घटस्थापना को भगवान श्री एकवीर हैहय का जन्म दिवस है।
॥ ॐ लक्ष्मीपुत्राय विद्महे विष्णुनन्दनाय धीमहि तऽन्नो हैहय प्रचोदयात् ॥
देवी भागवत पुराण के पंचम अध्याय के अनुसार भगवान श्री एकवीर हैहय, भगवान श्री विष्णु और जगत जननी श्री स्वरूपा माता लक्ष्मी के नियोगी संतान हैं।
हैहय जन्म की कथा बहुत अनोखी है। देवी भागवत पुराण के पंचम अध्याय के अनुसार एक बार भगवान श्री हरि विष्णु, जगत जननी देवी माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ धाम में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे, तभी वहां उच्चै:श्रवा अश्व पर सवार होकर सूर्य पुत्र रेवंत का आगमन हुआ। देवी लक्ष्मी उस अश्व के सौंदर्य पर मुग्ध होती हुई ध्यान मग्न हो गईं। विष्णु के पूछने और झकझोरने पर भी वह उनकी ओर ध्यान नहीं कर पाईं। विष्णु को उनकी इस अवज्ञा पर क्रोध आ गया और उन्होंने लक्ष्मी को सर्वत्र रमन करने वाली (रमा) अविश्वसनीय तथा अस्थिर बुद्धि कहते हुए अश्वी बनकर पृथ्वी पर विचरण करने का श्राप दे डाला। अपनी तंद्रा टूटने पर विष्णु द्वारा श्राप दिया जानकर वह उनके बिना जीवित न रह सकने एवं सतर्क रहते हुए किसी अन्य पर अनुरक्ति न रखने की शपथ खाते हुए अनुनय-विनय करने लगीं। लक्ष्मी के सहज अनुरोध पर विष्णु जी के शाप को संशोधन कर अश्वी रूप में पुत्र उत्पन्न कर उस योनि से मुक्त होकर अपने पास लौट आने की बात कही।
यहां इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि माता लक्ष्मी और उच्चै:श्रवा अश्व दोनों ही देवता और दानव के द्वारा किए गए समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे, इसलिए वे आपस में भाई-बहन भी थे और माता लक्ष्मी अपने इसी भाई को मुग्ध होकर देख रही थीं।
भगवान श्री हरि विष्णु के श्राप से अश्वी रूपी लक्ष्मी यमुना तमसा नदियों के संगम पर आकर शिवजी की आराधना करने लगी लक्ष्मी के तप से प्रसन्न होकर पार्वती शिव ने दर्शन देते हुए उनकी इच्छा पूछने पर लक्ष्मी ने श्राप का वर्णन करते हुए अपने उद्धार की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने लक्ष्मी को, विष्णु द्वारा अश्व रूप में अवतार लेकर उनके साथ विचरण करने और पुत्र को जन्म देकर वैकुंठ वापस जाने का वरदान दिया। इस तरह जगत जननी माता लक्ष्मी को भगवान श्री हरि विष्णु से एक पुत्र की प्राप्ति हुई। बालक का नाम एकवीर रखा गया। भगवान श्री हरि विष्णु ने नवजात बालक को पालन पोषण के लिए तुर्वसु को सौंपकर वैकुंठ प्रस्थान किया। यही बालक हैहय कहलाया और इससे हैहयवंश चला।
ब्रह्मा की वंशावली में अत्रि → चंद्रमा → बुध → पुरुरवा हुए। पुरुरवा के पुत्र आयु एवं इंदुमती/प्रभा से नहुष का जन्म हुआ था। राजा नहुष हिन्दू पौराणिक कथाओं और महाभारत ग्रंथ के अनुसार चंद्रवंश के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मात्मा और शक्तिशाली राजा थे। नहुष के पुत्र ययाति और शुक्राचार्य की बेटी देवयानी से तुर्वसु का जन्म हुआ था। ययाति की दो पत्नियां थी देवयानी और शर्मिष्ठा। शर्मिष्ठा के तीन और देवयानी के दो पुत्रों में एक थे तुर्वसु। ययाति ने अपनी वृद्धावस्था के बदले अपने पुत्रों से उनका यौवन मांगा लेकिन चार पुत्रों के नकार दिए जाने पर ययाति ने उनको शाप दिया। इन शापित पुत्रों में तुर्वसु भी एक थे। भगवान श्री हरि विष्णु ने वैकुंठ धाम जाने से पहले, धरती पर अश्व रुप से मुक्त अपने और जगत जननी माता लक्ष्मी से जन्में पुत्र एकवीर, जो भगवान श्री हरि विष्णु और जगत जननी माता लक्ष्मी के अश्व रूप से जन्म के कारण हैहय कहलाए, को पालन-पोषण के लिए यदु के छोटे भाई राजा तुर्वसु को सौंप दिया था। राजा तुर्वसु हैहय के पालक पिता थे। यदु से ही आगे यदुवंश चला और हैहय से हैहय वंश।
चन्द्रवंश के राजा यदु से यदुवंश चला और राजा तुर्वसु यदु के छोटे भाई और हैहय के पालक पिता होने के कारण ही चन्द्रवंश और यदुवंश की वंशावली में हैहय को स्थान दिया गया है लेकिन देवी भागवत पुराण के पंचम अध्याय से यह स्पष्ट है कि हैहय जगत जननी माता लक्ष्मी और भगवान श्री हरि विष्णु के पुत्र हैं और उनसे ही हैहयवंश का प्रारंभ हुआ। इसी हैहयवंश के कुलदीपक और हम सनातन हिंदू धर्म, क्षत्रिय वर्ण के कलाल, कलार, कलवार, कलचुरियों के आराध्य भगवान श्री अर्जुन कार्तवीर्य/सहस्रार्जुन/सहस्रबाहु का जन्म हुआ था।
भगवान श्री एकवीर हैहय से ही हैहयवंश का प्रारंभ हुआ। इसी वंशावली में एकवीर हैहय से धर्म – धर्मनेत्र – कुन्ती – सहजीत (संहत) – महिष्मान (माहिष्मतीपुरी के संस्थापक) – रुद्रश्रेण्य (भद्रश्रेण्य) – दुर्दम – कनक (धनक) – कृतवीर्य और कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन, जो कृतवीर्य के पुत्र होने के कारण कार्तवीर्य और भगवान श्री दत्त जो अत्रि ऋषि पुत्र होने के कारण दत्तात्रेय कहलाएं के सहस्र (हजार) भुजाधारी होने के वरदान से सहस्रबाहु हुए और सहस्रार्जुन कहलाएं।
यह जानना, समझना बहुत आवश्यक है कि हैहयवंशी क्षत्रिय, चंद्रवंशी नहीं हैं क्योंकि हैहयवंश भगवान श्री विष्णु और श्री स्वरूपा माता लक्ष्मी की नियोगी संतान हैहय से प्रारंभ हुआ है। हैहयवंश को चंद्रवंश से या यदुवंश से जोड़ना गलत है। इसका प्रमाण देवी भागवत पुराण का पंचम अध्याय है।
सनातन हिंदू धर्म के धर्मग्रंथों में वर्णित हमारे भगवान श्री अर्जुन कार्तवीर्य, सहस्रार्जुन, सहस्रबाहु इसी हैहयवंश के कुलदीपक और हम हैहयवंशियों के आराध्य हैं। इतिहास साक्षी है, इस वंश के वीर प्रतापी राजाओं ने कलचुरि साम्राज्य की स्थापना कर 1200 वर्ष तक शासन किया और कलचुरि संवत् चलाया। वर्तमान में कलचुरि संवत् 1778 चल रहा है। दीपावली पाडवा, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से कलचुरि संवत् का वर्ष 1779 का प्रारंभ होगा।
देवता की संतान, हैहय क्षत्रिय वंश के जनक, हमारे पितृ पुरुष हैहय के जन्म दिवस और शक्ति की उपासना और आराधना का पर्व, शारदीय नवरात्रि के उपलक्ष्य पर हार्दिक मंगलकामनाएं।
ॐ स्वस्ति अस्तु।
-पवन नयन जायसवाल
साहित्यकार
राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष- अखिल भारतीय जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा
संयोजक- भगवान श्री सहस्रार्जुन जन्मोत्सव जागरूकता अभियान
सुसंवाद, संदेश- 9421788630
pawannayanjaiswal@gmail.com
अमरावती, विदर्भ, महाराष्ट्र
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भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की नियोगी संतान हैं भगवान श्री एकवीर हैहय
- by admin
- October 10, 2026
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